Phonetic typing in Indian Languages

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Monday, January 9, 2017

भाषा का उद्भव और विकास....!

कई साल पहले अत्यंत प्रिय मेरी मौसी को दिल का दौरा पड़ गया। अचानक उत्पन्न यह परिस्थिति मेरे लिए वज्रपात से कम नहीं थी। मैं बुरी तरह से घबरा गया। क्योंकि मौसी मेरे दिल के सबसे  करीब थी। उनके बगैर जीवन की कल्पना भी मेरे लिए मुश्किल थी। सुखद आश्चर्य के तौर पर कुछ घंटों में ही मौसी खतरे से बाहर आ गई। थोड़े उपचार के बाद वह घर भी लौट आई। मैं फिर जीवन संघर्ष में जुट गया। लेकिन महज एक पखवाड़े के भीतर उन्हें दूसरी बार दिल का दौरा पड़ा । अपने स्वाभाव के विपरीत शुरूआती कुछ घंटे मैं सामान्य बना रहा। मुझे गलतफहमी रही कि वे जिस तरह पहली बार बीमारी के बाद वे जल्द स्वस्थ हो गई थी, इस बार भी ऐसा ही होगा। लेकिन परिदृश्य में होता निरंतर बदलाव और परिजनों की बातचीत से मुझे आभास हो गया कि अपनी सबसे प्रिय मौसी को अलविदा कहने  का समय आ गया है। इसके बाद मेरा गला रूंध गया। मुंह से शब्द निकलने बंद हो गए। लगातार दो दिनों तक बस आंखों के आंसू ही मेरी भाषा बने रहे। इसी तरह जीवन में मैंने कई बार महसूस किया है कि अचानक मिली खुशखबरी, शोक-समाचार या सुखद आश्चर्य  के चलते सबसे पहले आदमी की भाषा खो जाती है। ऐसे में हमारी भावनाएं केवल भाव-भंगिमाओं के जरिए ही अभिव्यक्त होने लगती हैं। अलग-अलग परिस्थितियों में अपनों की उपस्थिति और भाव-भंगिमाएं आदमी के दिल में उतर जातीं हैं। किसी को कुछ कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। सुख और दुख की ये परिस्थितियां बताती है कि भाषा मनुष्य के सामान्य लोक- व्यवहार के लिए एक टूल है। यह एक ऐसा माध्यम जिसके जरिए मनुष्य अपनी बात दूसरों तक पहुंचाता है।

किसी क्षेत्र की भाषा क्या होगी यह परिस्थितियों पर निर्भऱ है। क्रमिक विकास से विकसित हुई भाषाओं के बीच किसी भी रूप में अंतर विरोध नहीं है। न कोई भाषा अच्छी या बुरी कही जा सकती है। भाषा का उद्भव और विकास परिस्थितियों पर निर्भर है। मैं जिस शहर से आता हूं वहां मिश्रित आबादी है। इसलिए सभी ने सहज ही हिंदी को अपनी भाषा के तौर पर अपना लिया है। वहीं दूसरी तरह की मातृभाषाओं के लोग सहज ही उन भाषाओं को भी सीख गए जिसे बोलने वाले उनके आस-पास, शहर-मोहल्लों में रहते हैं। बेशक, इसकी शुरूआत जोर-जबरदस्ती या कुछ पाने की मंशा से नहीं हुई। लोक-व्यवहार में लोग पहले पहल हंसी-मजाक में अल्प प्रचलित भाषाओं में बोलने लगते और धीरे-धीरे  उस भाषा में काफी हद तक पारंगत हो जाते हैं। बचपन में मैं अपने पैतृक गांव जाने से इसलिए कतराता था, क्योंकि वहां की आंचलिक भाषा मेरी समझ में नहीं आती थी। इसकी वजह से मैं जितने दिन गांव में रहता, असहज बना रहता। लेकिन मजबूरी में ही सही गांव आते-जाते रहने से मैं काफी हद तक वहां की आंचलिक भाषा को समझने लगा। भले ही मैं धारा प्रवाह वहां की भाषा न बोल पाऊं। लेकिन दो लोगों की बातचीत से मैं अच्छी तरह से समझ जाता कि वे आपस में क्या बात कर रहे हैं।


भाषा का उद्भव और विकास कई बातों पर निर्भऱ हैं। अक्सर देखा गया है कि भाषा की समृद्धि काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वहां की जीवन शैली और लोक-व्यवहार कैसा है। जिस समाज में जीवन सहज-सरल है और लोग विचारशील होते हैं तो वहां की भाषा स्वतः ही मीठी और परिमार्जित होने लगती है। क्योंकि इससे जुड़े लोग भाषा के शोधन पर लगातार जोर देते रहते हैं। वहीं विषम परिस्थितियों के बीच कठोरतम दैनंदिन जीवन वाले क्षेत्र की भाषा में ठेठ और अक्खड़पन हावी रहता है। क्योंकि इस भाषा को बोलने वालों को परिस्थितियों से जूझने के बाद इतना समय नहीं मिल पाता कि वे भाषा के परिमार्जन व दूसरी बातों की ओर ध्यान दे सकें। इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि सुसंस्कृत समाज में बच्चों के नाम काफी सोच-विचार के बाद तय होते हैं। वहीं इसके विपरीत समाज में जिसने जो तय कर दिया वही बच्चों का नाम बन जाता है। बच्चों के व्यस्क होने के बाद भी कोई उनमें संशोधन या परिवर्तन की आवश्यकता महसूस नहीं करता। मसलन मैने अपने गांव में अनेक लोगों के नाम लड्डू, रसगुल्ला, लल्लू और कल्लू सुने हैं। इसलिए यह तय है कि भाषा हृदय से निकलने वाली भावना है।महज सुविधा के दृष्टिकोण से भाषाओं का उद्भव और विकास हुआ है। हर भाषा का एकमात्र उद्देश्य आदमी से आदमी को जोड़ना है। इसमें कहीं कोई अंतर-विरोध नहीं है।

कोई किसी भी भाषा को महान या दूसरी भाषाओं को तुच्छ नहीं कह सकता। हालांकि यह भी सच है कि समाज में भाषा के नाम पर अनेक लड़ाई-झगड़े हुए हैं। इसे कम या खत्म करने में तकनीकी अथवा प्रौद्योगिकी का बहुत बड़ा हाथ है। मुझे बड़ी खुशी होती है जब मैं देखता हूं कि मात्र धुन मधुर लगने पर ही लोग मोबाइल पर उन गानों को भी बार-बार सुनते हैं जो उनकी अपनी भाषा में नहीं है। कई तो ऐसे गानों को अपनी कॉलर या रिंग टोन भी बना लेते हैं। भाषाओं के मामले में उदारता का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है। शादी-समारोह में बजने वाले गीतों में भी अब भाषाई संकीर्णता कहीं नजर नहीं आती। किसी भी भाषा के गीत में रिदम और लय महसूस होते ही लोग उस पर नाचने-थिरकने लगते हैं। यही नहीं, उन्हीं गीतों को बार-बार बजाने की मांग भी अधिकारपूर्वक होती है। यह बड़ा परिवर्तन महज दो दशकों में हुआ है। आज एक ही मोबाइल में अनेक भाषाओं में लिखने और संदेश भेजने की सुविधा है। अब हर कोई इसे आत्मसात कर चुका है। कला व मनोरंजन जगत भी भाषाओं  को एक मंच पर लाने में सफल रहा है। आज टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कॉमेडी शो के जरिए हर भाषा-भाषी लोग उसका आनंद लेते हुए हंसते-खिलखिलाते हैं। कोई यह नहीं सोचता कि यह किस भाषा में पेश किया जा रहा है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि भारतीय भाषाऐं आपस में निकट आ रहीं हैं और हमारी भाषाओं का भविष्य उज्ज्वल है।

यह लेख श्री तारकेश कुमार ओझा जी द्वारा लिखा गया है। श्री ओझा जी पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और पेशे से पत्रकार हैं तथा वर्तमान में दैनिक जागरण से जुड़े हैं। इसके अलावा वे कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइटों के लिए भी स्वतंत्र रुप से लिखते रहते हैं।
संपर्कः  भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर (पं.बं.) पिनः 721301, जिला - पश्चिम मेदिनीपुर, दूरभाषः 09434453934

नोट: आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। Hindi e-Tools || हिंदी ई-टूल्स का इनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

Tuesday, January 3, 2017

भक्तिकालीन हिंदी साहित्य और तत्कालीन परिस्थितियाँ

संवत 1375-1700 वि. तक के कालखण्ड में सृजित हिंदी साहित्य में भक्ति भावना की प्रधानता होने के कारण आचार्य शुल्क ने इस काल को भक्तिकाल का नाम दिया है। प्रमुख आलोचक डा. नगेन्द्र ने इस समय सीमा को 1350-1650 ई. माना है। आदिकाल के वीरता और श्रृंगार से परिपूर्ण साहित्य से एकदम भिन्न इस काल के साहित्य में भक्ति की शान्त निर्झरिणी बहती है।


भक्तिकालील हिंदी साहित्य की परिस्थितियाँ
कोई भी साहित्यिक प्रवृत्ति यूँ ही अचानक विकसित नहीं होती, उसके पीछे कई सारे प्रमुख कारक, कई शक्तियाँ और तमाम परिस्थितियाँ सक्रिय रहती हैं। साहित्य भी इनसे अवश्य प्रभावित होता है और कालांतर में एक नया स्वरूप ग्रहण करता है। लगभग 300 वर्षों के भक्ति साहित्य का सृजन कोई सहज-सरल घटना नहीं थी। तत्कालीन इतिहास और समाज पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि इसके पीछे कोई एक नहीं बल्कि अनेक परिस्थितियां सक्रिय थीं। संक्षेप में देखें तो भक्तिकाल में निम्नलिखित परिस्थितियां सामने आती हैं -

1.     राजनीतिक परिस्थितियाँ:
  • सन 1375-1526 ई तक उत्तर भारत में तुगलक वंश, सैयद वंश, लोदी वंश, तत्पश्चात मुगल आदि अनेक राजवंशों का शासन रहा। तुगलक वंश में न्याय व्यवस्था ‘कुरान’ और ‘हदीस’ पर आधारित थी।
  • बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, और शाहजहाँ आदि का शासन भक्तिकाल की समय-सीमा में ही था। इसके अलावा कुछ वर्षों तक शेरशाह नामक अफगान का भी शासन रहा।
  • जहाँ फिरोज शाह तुगलक हिंदुओं के प्रति असहिष्णु था वहीं शेरशाह ने मालगुजारी और कर की उचित व्यवस्था की।
  • अकबर में अन्य मुगल शासकों की अपेक्षा हिन्दू जनता के प्रति अधिक सहिष्णुता थी तथा उसके शासन काल में भू-व्यवस्था में भी पर्याप्त सुधार हुआ।
  • राजनीतिक दृष्टि से यह काल हिंदुओं के परायण का काल था।
  • इस तरह देखा जाए तो भक्तिकाल के आरम्भिक दिनों में इस्लामी आक्रांताओं के आगमन से यह काल उथल-पुथल, युद्ध, संघर्ष और अशांति का काल रहा। किंतु बाद में धीरे-धीरे शांति और स्थिरता की ओर बढ़ा।
इस तरह देखा जाए तो भक्तिकाल के आरम्भिक दिनों में इस्लामी आक्रांताओं के आगमन से यह काल उथल-पुथल, युद्ध, संघर्ष और अशांति का काल था। किंतु बाद में धीरे-धीरे शांति और स्थिरता की ओर बढ़ा।

2.    सामाजिक परिस्थितियाँ:
  • भक्तिकाल में भारतीय समाज प्रमुख रूप से दो वर्गों में विभाजित था। एक वर्ग राजा, महाराजा, सेठ-साहूकार, सुल्तान तथा सामंतों आदि का था वहीं दूसरे वर्ग में किसान, मज़दूर, दलित, राज्य कर्मचारी और पारम्परिक काम धंधे में लगे लोग थे।
  • हिंदुओं में वर्ण व्यवस्था / जाति व्यवस्था अत्यंत कठोर थी और छुआछूत की भावना व्याप्त थी। इसी जाति व्यवस्था के कारण एक केन्द्रीय सत्ता होने के बावजूद भी समाज में एकता नहीं थी।
  • स्त्रियों को बहुत अधिकार नहीं मिले थे, उन्हें दोयम दर्जे का नागरिकता प्राप्त थी। सती प्रथा और पर्दा प्रथा का भी प्रचलन था।
  • इस्लाम में मौजूद समानता की भावना ने वंचित वर्ग को आकर्षित किया। इसके परिणाम स्वरूप निम्न वर्ग के लोगों में हिन्दू धर्म से इस्लाम में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ।
  • साधु सन्तों में पाखंड एवं वाह्याडम्बरों का बोलबाला था।
  • कला के क्षेत्र में हिन्दू संस्कृति पर मुस्लिम संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
  • दोनों संस्कृतियों में पारम्परिक आदान-प्रदान हुआ।
भक्तिकाल में समाज परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा था। एक तरफ परम्परावादी लोग अपनी परम्पराओं को बनाए रखने के पक्ष में थे तो दूसरी तरफ नव इस्लाम के हितैशी लोग स्वयं को प्रगतिशील बता कर समाज में बदलाव लाना चाहते थे। तत्कालीन कवियों की साहित्य सर्जना उक्त परिस्थितियों से प्रभावित थी और उनकी रचनाओं यह स्पष्ट देखा जा सकता है।


3.    धार्मिक परिस्थितियाँ:
  • वैदिक धर्म के स्वरूप में परिवर्तन हुआ तथा वैदिक कर्मकांडों की महत्ता कम हो गयी। इन्द्र, वरूण आदि अनेक वैदिक देवताओं के स्थान पर विष्णु (मूल ब्रह्म) की पूजा विभिन्न रूपों में होने लगी।
  • वैदिक धर्म के केन्द्रीय देवता इन्द्र के स्थान पर विष्णु को मुख्य शक्ति के रूप में स्थापित किया गया। आगे चलकर विष्णु के ही दो रूपों को कृष्ण और राम के स्वरूप में स्वीकारा गया और इसी से क्रमशः कृष्ण भक्ति धारा और राम भक्ति धारा की उत्पत्ति हुई।
  • बौद्ध धर्म विकृतियों के फलस्वरूप हीनयान और महायान दो शाखाओं में विभक्त हे गया।
  • महायानियों ने जनता के निम्न वर्ग को जादू-टोना, तंत्र-मंत्र के चमत्कार दिखा कर प्रभावित किया।
  • नाथों एवं सिद्धों में कर्मकांड के स्थान पर गुरु को महत्व दिया गया।
  • हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों में पूजा, नमाज, माला, तीर्थयात्रा, अज़ान, रोजा जैसे वाह्य आडंबरों की अधिकता हो गयी थी।
  • सूफियों ने हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता का आधार तैयार किया तथा समाज के सभी वर्गों में बंधुत्व की भावना का संचार किया।
  • संत कवियों ने राम के लोक रक्षक स्वरूप तथा कृष्ण के लोक रंजक स्वरूप की स्थापना की।
  • ईश्वर के सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपों को मान्यता।
दक्षिण से शुरू हुई भक्ति की लहर उत्तर भारत में भी आई और यहां इसे खुले दिल से स्वीकार भी किया गया। हिंदू और इस्लाम दोनों ही धर्मों में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों एवं बाह्याडम्बर को रोकने के लिए तत्कालीन संतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कबीर का समाज सुधार, जायसी का प्रेम, तुलसी का समन्वयवाद तथा सूरदास द्वारा कृष्ण के लोकरंजन स्वरूप का चित्रण निश्चय ही तत्कालीन परिस्थितियों की देन है।


4.    सांस्कृतिक परिस्थितियाँ:
  • सांस्कृतिक दृष्टि से देखा जाए तो भक्तिकाल एक मिश्रित या समन्वित संस्कृति के विकास का काल है।
  • भारत में इस्लाम के आने से पहले ही कई अन्य जातियाँ का आगमन हो चुका था। इन जातियों के प्रभाव से भारत में एक मिली-जुली संस्कृति का विकास हुआ।
  • इस्लाम के आने से एक बार पुनः भारत में सांस्कृतिक संक्रमण का दौर आया और खान-पान, रहन-सहन, शिक्षा, साहित्य, स्थापत्य कला, मूर्तिकला, संगीत एवं चित्रकला में काफी बदलाव देखने को मिला।
  • विदेशी तुर्क एवं भारतीय स्थापत्य शैली के मिश्रण से गुजराती एवं जौनपुरी स्थापत्य शैली का विकास हुआ।
  • भक्तिकाल के कवियों ने भक्ति साहित्य को संगीत से जोड़ा। वे अपनी रचनाओं को गा-गाकर लोगों तक पहुँचाते थे। कुछ कवियों ने विभिन्न रागों में भी काव्य रचना की है।
  • भक्तिकाल में संगीत के साथ ही चित्रकला की भी खूब उन्नति हुई। मुगल शासकों द्वारा चित्रकला को राजाश्रय प्रदान किया गया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भक्तिकाल में पर्व-त्योहार, उत्सव, साहित्य एवं कलाओं आदि के साथ-साथ संस्कृति के लगभग सभी क्षेत्रों में आपसी समन्वय व मिश्रण के माध्यम से एक मिश्रित अथवा समन्वित संस्कृति का विकास हुआ।

निश्चय ही भक्तिकाल का साहित्य श्रेष्ठ, अनुपम एवं अद्वितीय है। हम यकीनन कह सकते हैं कि भक्तिकाल  के साहित्य को तत्कालीन परिस्थितियों ने काफी हद तक प्रभावित किया। इसी का परिणाम है कि इस काल की साहित्य रचना अपने पूर्ववर्ती वीरता और श्रृंगार से परिपूर्ण साहित्य से काफी भिन्न है। अब साहित्य में वीरता और श्रृंगार के स्थान पर भक्ति की प्रधानता हो गयी थी।

Tuesday, December 27, 2016

हिंदी की दुनिया और दुनिया में हिंदी

वैश्विक स्तर पर विभिन्न भाषाओं की प्रभावशीलता से संबंधित "Power Language Index" नाम से जारी एक हालिया शोध के परिप्रेक्ष्य में हिंदी की वैश्विक स्थिति और हकीक़त से रूबरू कराता एक विश्लेषणात्कम लेख।
अभी हाल ही में एक खबर आयी थी वैश्विक स्तर पर दुनिया की सर्वाधिक प्रभावशाली 124 भाषाओं में हिंदी का 10वां स्थान है। इसमें यदि हिंदी की बोलियों और उर्दू को भी मिला दिया जाए तो यह स्थान आठवां हो जाएगा और इस तरह इस सूची में कुल 113 भाषाएं रह जाएगीं। इस खबर से सभी हिंदी प्रेमियों में उत्साह का माहौल है। भाषाओं की वैश्विक शक्ति का यह अनुमान INSEAD के प्रतिष्ठित फेलो, Dr. Kai L. Chan द्वारा मई, 2016 में तैयार किए गए पावर लैंग्वेज इन्डेक्स (Power Language Index) पर आधारित है।


इस पावर लैंग्वेज इन्डेक्स का अध्ययन करने पर चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। इंडेक्स में हिंदी की कई लोकप्रिय बोलियों को हिंदी से अलग दर्शाया गया है। 113 भाषाओं की इस सूची में हिंदी की भोजपुरी, मगही, मारवाड़ी, दक्खिनी, ढूंढाड़ी, हरियाणवी बोलियों को अलग स्थान दिया गया है। इससे पहले वीकिपीडिया और एथनोलॉग द्वारा जारी भाषाओं की सूची में भी हिंदी को इसकी बोलियों से अलग दिखाया गया था, जिसका भारत में भारी विरोध भी हुआ था। “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार हिंदी को खंडित करके देखे जाने का सिलसिला रूक नहीं रहा है। यह जानबूझ कर हिंदी को कमजोर करके दर्शाने का षड़यंत्र है और ऐसी साजिशें हिंदी की सेहत के लिए ठीक नहीं। डॉ. चैन की भाषाओं की तालिका के अनुसार, यदि हिंदी की सभी बालियों को शामिल कर लिया जाए तो हिंदी को प्रथम भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से विश्व में दूसरा स्थान दिया गया हैं। परन्तु पावर लैंग्वेज इंडेक्स में यह भाषा आठवें स्थान पर है। वहीं इंडेक्स में अंग्रेजी प्रथम स्थान पर है, जबकि अंग्रेजी को प्रथम भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से चौथा स्थान प्राप्त है।”
पावर लैंग्वेज इंडेक्स में भाषाओं की प्रभावशीलता के क्रम निर्धारण में भाषाओं के भौगोलिक, आर्थिक, संचार, मीडिया व ज्ञान तथा कूटनीतिक प्रभाव को ध्यान में रखकर अध्ययन किया गया है। जिन पांच कारकों के आधार पर ये इंडेक्स तैयार किया गया है, उनमें भौगोलिक व आर्थिक प्रभावशीलता का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यदि हिंदी से उसकी उपर्युक्त बोलियों को निकाल दिया जाए तो इसका भौगोलिक क्षेत्र बहुत सीमित हो जाएगा। भौगोलिक कारक में संबंधित भाषा को बोलने वाले देश, भूभाग और पर्यटकों के भाषायी व्यवहार को सम्मिलित किया गया है। हिंदी की लोकप्रिय बोलियों को उससे अलग दिखाने पर इन तीनों के आंकड़ों में निश्चित तौर पर कमी आएगी। भौगोलिक कारक के आधार पर हिंदी को इस सूची में 10 वां स्थान दिया गया है। डॉ. चैन के भाषायी गणना सूत्र का प्रयोग करते हुए, यदि हिंदी और उसकी सभी बोलियों के भाषाभाषियों की विशाल संख्या के अनुसार गणना की जाए तो यह स्थान निश्चित तौर पर शीर्ष पांच में आ जाएगा।
इन्डेक्स का दूसरा महत्वपूर्ण कारक आर्थिक प्रभावशीलता है। इसके अंतर्गत भाषा का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव का अध्ययन किया गया है। इसमें हिंदी को 12वां स्थान दिया गया है। इस इन्डेक्स को तैयार करने का तीसरा कारक है संचार, यानी लोगों की बातचीत में संबंधित भाषा का कितना इस्तेमाल हो रहा है। इंडेक्स का चौथा कारक अत्यंत महत्वपूर्ण है, मीडिया एवं ज्ञान के क्षेत्र में भाषा का इस्तेमाल। इसके अंतर्गत भाषा की इंटरनेट पर उपलब्धता, फिल्मों, विश्वविद्यालयों में पढ़ाई, भाषा में अकादमिक शोध ग्रंथों की उपलब्धता के आधार पर गणना की गई है। इसमें हिंदी को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है। विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन और हिंदी फिल्मों का इसमें महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी की लोकप्रियता में बॉलीवुड की वेशेष योगदान है। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री का अभी घोर अभाव है। जहां इंटरनेट पर अंग्रेजी सामग्री की उपलब्धता 95 प्रतिशत तक है, वहीं हिंदी की उपलब्धता मात्र 0.04 प्रतिशत है। इस दिशा में हिंदी को अभी लंबा रास्ता तय करना है। इस इन्डेक्स का पांचवा और अंतिम कारक है- कूटनीतिक स्तर पर भाषा का प्रयोग। इस सूची में कूटनीतिक स्तर पर केवल 9 भाषाओं (अंग्रेजी, मंदारिन, फ्रेच, स्पेनिश, अरबी, रूसी, जर्मन, जापानी और पुर्तगाली) को  प्रभावशाली माना गया है। हिंदी सहित बाकी सभी 104 भाषाओं को कूटनीतिक दृष्टि से एक समान स्थान (10 वां स्थान) दिया गया है, यानी कि सभी कम प्रभावशाली हैं। यहों एक बात उल्लेखनीय है, जब तक वैश्विक संस्थाओं में हिंदी को स्थान नहीं दिया जाएगा तब तक इसे कूटनीति की दृष्टि से कम प्रभावशाली भाषाओं में ही शामिल किया जाता रहेगा।


उपर्युक्त पावर लैंग्वेज इंडेक्स को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि विश्व भर में अनेक स्तरों पर हिंदी को कमजोर करके देखने की कोशिश की जा रही है। हिंदी को देश के भीतर हिंदी विरोधी ताकतों से तो नुकसान पहुंचाया ही जा रहा है, देश के बाहर भी तमाम साजिशें रची जा रही हैं। दुनिया भर में अंग्रेजी के बहुत सारे रूप प्रचलित हैं, फिर भी इस इंडेक्स में उन सभी को एक ही रूप मानकर गणना की गई है। परन्तु हिंदी के साथ ऐसा नहीं किया गया है। वैसे भारत के भीतर भी तो हिंदी की सहायक बोलियां एकजुट न होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व तलाश रही हैं और लगातार अपना संघर्ष तेज कर रही हैं। हिंदी की बोलियों की इसी आपसी फूट का फायदा साम्राज्यवादी भाषाओं द्वारा उठाया जा रहा है। आज आवश्यकता है हिंदी विरोधी इन गतिविधियों का डटकर विरोध किया जाए और इसके लिए सर्वप्रथम हमें हिंदी की बोलियों की आपसी लड़ाई को बंद करना होगा तथा सभी देशवासियों को अपने पद व हैसियत के अनुसार हिंदी की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए निरंतर योगदान देना होगा। अंततः हमारी अपनी भाषा के प्रति जागरूक होने की जिम्मेदारी भी तो हमारी अपनी ही है।

यह लेख कोल इंडिया लिमिटेड की अनुषंगी कंपनी, भारत कोकिंग कोल लिमिटेड, धनबाद में सहायक प्रबंधक (राजभाषा) के पद कार्यरत श्री दिलीप कुमार सिंह जी द्वारा लिखा गया है। आप श्री दिलीप जी से उनके Facebook वाल या Google+ के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

नोट: आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। Hindi e-Tools || हिंदी ई-टूल्स का इनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।
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Friday, December 23, 2016

हिंदी की फुल स्पीड

जब मैंने होश संभाला तो देश में हिंदी के विरोध और समर्थन दोनों का मिला-जुला माहौल था। एक बड़ी संख्या में लोग हिंदी प्रेमी थे, जो लोगों से हिंदी अपनाने की अपील किया करते थे। वहीं दक्षिण भारत के राज्यों, खासकर तमिलनाडु में हिंदी के प्रति हिंसक विरोध की खबरें भी जब-तब सुनने-पढ़ने को मिला करती थीं। हालांकि, काफी प्रयास के बावजूद उस समय इसकी वजह मेरी समझ में नहीं आती थी।

संयोगवश 80 के दशक के मध्य में तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में जाने का मौका मिला, तो मुझे लगा कि राजनीति को छोड़ भी दें तो भी यहां के लोगों की हिंदी के प्रति समझ बहुत ही कम है। तब वहां बहुत कम ही लोग ऐसे हुआ करते थे जो टूटी-फूटी हिंदी में किसी सवाल का जवाब दे पाते थे। ज्यादातर ‘नो हिंदी...’ कह कर आगे बढ़ जाते। चूंकि मेरा ताल्लुक रेलवे से है, लिहाजा इसके दफ्तरों में टंगे बोर्डों पर “हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, इसे अपनाइए... दूसरों को भी हिंदी अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें” जैसे वाक्य बरबस ही मेरा ध्यान आकर्षित करते थे। सितंबर महीने में शहर के विभिन्न भागों में हिंदी दिवस पर अनेक कार्यक्रम भी होते थे। जिसमें राष्ट्रभाषा के महत्व और इसकी उपयोगिता पर लंबा-चौड़ा व्याख्यान प्रस्तुत किया जाता। हिंदी में बेहतर करने वाले पुरस्कृत भी होते। लेकिन, वाईटूके यानी 21 वीं सदी की शुरूआत से माहौल में तेजी से बदलाव होने लगा। हिंदी फिल्में तो पहले भी लोकप्रिय थी ही, 2004 तक मोबाइल की पहुंच आम आदमी तक हो गई। फिर शुरू हुआ मोबाइल पर रिंगटोन व डायलर टोन लगाने का दौर। मुझे यह देख कर सुखद आश्चर्य होता कि ज्यादातर हिंदीतर भाषियों के ऐसे टोन पर हिंदी गाने सजे होते थे। वहीं बड़ी संख्या में हिंदी भाषी अपने मोबाइल पर बांग्ला अथवा दूसरी भाषाओं के गाने रिंग या डायलर टोन के तौर पर लगाते।

इस दौर में एक बार फिर से यात्रा का संयोग बनने पर मैंने महसूस किया कि अब माहौल तेजी से बदल चुका है। देश के किसी भी कोने में हिंदी बोली और समझी जाने लगी है। और तो और आगंतुक को हिंदी भाषी जानते ही सामने वाला हिंदी में बातचीत शुरू कर देता है। 2007 तक वैश्वीकरण और बाजारवाद का प्रभाव बढ़ने पर छोटे शहरों व कस्बों तक में शापिंग मॉल व बड़े-बड़े ब्रांडों के शोरुम खुलने लगे, तो मैंने पाया कि हिंदी का दायरा अब राष्ट्रीय से बढ़ कर अंतरराष्ट्रीय हो चुका है। विदेशी कंपनिय़ों ने भी हिंदी की ताकत के आगे मानो सिर झुका दिया है। क्योंकि मॉल में प्रवेश करते ही... इससे सस्ता कुछ नहीं... मनाईए त्योहार की खुशी ... दीजिए अपनों को उपहार... जैसे रोमन में लिखे वाक्य मुझे हिंदी की शक्ति का अहसास कराते। इसी के साथ हिंदी विरोध ही नहीं हिंदी के प्रति अंध व भावुक समर्थन की झलकियां भी गायब होने लगीं। क्योंकि अब किसी को ऐसा बताने या साबित करने की जरूरत ही नहीं होती। ऐसे नजारे देख कर मैं अक्सर सोच में पड़ जाता हूं कि क्या यह सब किसी सरकारी या गैर सरकारी प्रयास से संभव हुआ है। मेरे हिसाब से तो बिल्कुल नहीं, बल्कि यह हिंदी की अपनी ताकत है जिसके बूते वह खुद की उपयोगिता साबित कर पाई। यही वजह है कि आज बड़ी संख्या में दक्षिण मूल के युवक कहते सुने जाते हैं, “यार, गुड़गांव में कुछ महीने नौकरी करने के चलते मेरी हिंदी बढ़िया हो गई है” या किसी बांग्लाभाषी सज्जन को कहते सुनता हूं, “तुम्हारी हिंदी बिल्कुल दुरुस्त नहीं है, तुम्हें यदि राज्य के बाहर नौकरी मिली तो तुम क्या करोगे? कभी सोचा है।” चैनलों पर प्रसारित होने वाले कथित टैलेंट शो में चैंपियन बनने वाले अधिकांश सफल प्रतिभागियों का अहिंदी भाषी होना भी हिंदी प्रेमियों के लिए एक सुखद अहसास है।


सचमुच राष्ट्रभाषा हिंदी के मामले में यह बहुत ही अनुकूल व सुखद बदलाव है। जो कभी हिंदी प्रेमियों का सपना था। यानी, एक ऐसा माहौल जहां न हिंदी के पक्ष में बोलने की जरूरत पड़े या न विरोध सुनने की। लोग खुद ही इसके महत्व को समझें। अपने आस-पास जो हिंदी का प्रति बदलता हुआ माहौल आज हम देख रहे हैं, ज्यादा नहीं दो दशक पहले तक उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आज के परिवेश को देखते हुए हम कह सकते हैं कि हमारी हिंदी अब ‘फुल स्पीड’ में है जो किसी के रोके कतई नहीं रुकने वाली...।

यह लेख श्री तारकेश कुमार ओझा जी द्वारा लिखा गया है। श्री ओझा जी पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और पेशे से पत्रकार हैं तथा वर्तमान में दैनिक जागरण से जुड़े हैं। इसके अलावा वे कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइटों के लिए भी स्वतंत्र रुप से लिखते रहते हैं।
संपर्कः  भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर (पं.बं.) पिनः 721301, जिला - पश्चिम मेदिनीपुर, दूरभाषः 09434453934

नोट: आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। Hindi e-Tools || हिंदी ई-टूल्स का इनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

Thursday, November 24, 2016

हिंदी साहित्य का आदिकाल : नामकरण और औचित्य

हिंदी साहित्य को एक व्यवस्थित स्वरूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से विद्वानों ने साहित्य के इतिहास को कई काल-खण्डों में विभाजित किया है। साहित्य के काल विभाजन के बाद अध्ययन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए तथा तत्कालीन प्रवृत्तियों व समय के अनुरूप प्रत्येक काल-खण्ड को एक अलग नाम दिया गया, यथा- आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल व आधुनिक काल आदि। हिंदी साहित्य के काल विभाजन एवं नामकरण के पीछे विभिन्न विद्वानों द्वारा अपने-अपने विचार रखते हुए उसके औचित्य को सिद्ध करने के प्रयास किए गए।


आइए, इस आलेख में हम हिंदी साहित्य के “आदिकाल के नामकरण और उसके औचित्य” के संबंध में हिंदी के कुछ प्रमुख आलोचकों और विद्वानों के विचारों और सिद्धांतों को जानने व समझने की कोशिश करते हैं -

आचार्य शुक्ल का नामकरण:-

  • 1929 ई. में प्रकाशित तथा शुक्ल जी द्वारा लिखित प्रथम तर्क संगत एवं अधिकांश विद्वानों द्वारा प्रमाणित “हिन्दी साहित्य का इतिहास” में आदिकाल (1050- 1375 ई.) को “वीरगाथा काल” नाम दिया गया ।
  • इस नामकरण का मुख्य आधार उस समय “वीरगाथाओं की प्रचुरता और उनकी लोकप्रियता” को माना गया।

साहित्य सामाग्री:-

शुक्ल जी ने “वीरगाथा काल” नामकरण के लिए निम्नलिखित 12 रचनाओं को आधारभूत साहित्य सामग्री के रूप में स्वीकार किया:-

क्र. सं. रचना का नाम रचनाकार रचनाकाल टिप्पणी
1. विजयपाल रासो नल्ल सिंह 1350 वि. मिश्र बंधुओं ने समय 1355 वि. माना है
2. हमीर रासो शारंगधर 1350 वि. यह ग्रंथ आधा ही प्राप्त है
3. कीर्ति लता विद्यापति 1460 वि. समय सीमा से बाहर
4. कीर्ति पताका विद्यापति 1460 वि. समय सीमा से बाहर
5. खुमान रासो दलपति विजय 1290 वि. मोतीलाल मेनारिया ने इसका समय 1545 वि. माना है
6. बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह 1292 वि. प्रामाणिकता संदिग्ध है
7. प्रथ्वीराज रासो चंद्रबरदाई 1225-40 वि. स्वयं शुक्ल जी ने इस ग्रंथ के अर्ध-प्रामाणिक माना है
8. जयचंद्र प्रकाश भट्ट केदार 1225 वि. रचना अप्राप्त है, उल्लेख मात्र मिलता है
9. जयमयंक जस चन्द्रिका मधुकर कवि 1240 वि. रचना अप्राप्त है, उल्लेख मात्र मिलता है
10. परमाल रासो जगनिक 1230 वि. मूलरूप अज्ञात
11. खुसरो की पहेलियां अमीर खुसरो 1350 वि. वीरगाथाओं की परिपाटी से विचलन
12. विद्यापति पदावली विद्यापति 1460 वि. समय सीमा से बाहर
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में:- “इसी संक्षिप्त सामाग्री को लेकर थोड़ा-बहुत विचार हो सकता है, इसी पर हमें संतोष करना पड़ता है।

शुक्ल जी के नामकरण की आलोचना:-

शुक्ल जी द्वारा आदिकाल का नामकरण वीरगाथा काल के रूप में किए जाने के संबंध में विभिन्न विद्वानों में मतभेद रहे हैं। इस बारे में कुछ प्रमुख विद्वानों के मत निम्नानुसार हैं:-
  • शुक्ल जी ने अनेक रचनाओं को अपभ्रंश की कहकर हिन्दी के खाने से अलग कर दिया है। जबकि स्वयं उनके द्वारा चुनी गई 12 राचनाओं में प्रथम 4 अपभ्रंश की ही शामिल हैं।
  • पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी के अनुसार “अपभ्रंश मिश्रित हिंदी ही पुरानी हिंदी है।
  • डॉ. त्रिगुणायत के अनुसार “अपभ्रंश मिश्रित तमाम रचनाएँ, जिनके संबंध में कुछ विद्वानों को अपभ्रंश की होने का भ्रम हो गया है, पुरानी हिंदी की रचनाएँ ही मानी जाएंगी।"
  • राहुल सांकृत्यायन हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि के अनुसार 850 वि. के आस-पास उपलब्ध अपभ्रंश की मानी जानी वाली रचनाएँ, हिन्दी के आदिकाल की सामाग्री के रूप में हैं। इसी आधार पर सिद्ध सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना जाएगा।

विभिन्न विद्वानों द्वारा दिए गए नाम और उनका औचित्य:-

हिंदी साहित्य के प्रथम पड़ाव अर्थात आदिकाल को विभिन्न विद्वानों द्वारा कई अलग-अलग नामों से अभिहित किया गया है। आदिकाल के के नामकरण के संबंध में कुछ प्रमुख विद्वानों के मत निम्नानुसार हैं -
  • आचार्य शुक्ल:- वीरगाथाओं की प्रचुरता और लोकप्रियता के आधार पर “वीरगाथा काल” नाम दिया।
  • डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी:- द्विवेदी जी के अनुसार वीरगाथा नाम के लिए कई आधार ग्रंथ महत्वपूर्ण और लोकप्रिय नहीं हैं तथा कइयों की प्रामाणिकता, समयसीमा आदि विवादित है। अत: “आदिकाल” नाम ही उचित है, क्योंकि साहित्य की दृष्टि से यह काल अपभ्रंश काल का विकास ही है।
  • रामकुमार वर्मा:- रामकुमार वर्मा ने इसे “चारण काल” कहा। उनके अनुसार इस काल के अधिकांश कवि चारण अर्थात राज-दरबारों के आश्रय में रहने वाले व सम्राटों का यशगान करने वाले ही थे।
  • महावीर प्रसाद द्विवेदी:- आरम्भिक अवस्था या कहें कि हिंदी साहित्य के बीज बोने की समयावधि के आधार पर महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने इस काल को “बीज-वपन काल” कहा। वैसे यह नाम भी आदिकाल का ध्योतक है।
  • राहुल सांकृत्यायन:- सिद्ध सामंत युग, उनके अनुसार 8वीं से 13 वीं शताब्दी के काव्य में दो प्रवृत्तियां प्रमुख हैं- 1.सिद्धों की वाणी- इसके अंतर्गत बौद्ध तथा नाथ-सिद्धों की तथा जैन मुनियों की उपदेशमूलक तथा हठयोग से संबंधित रचनाएँ हैं। 2.सामंतों की स्तृति- इसके अंतर्गत चारण कवियों के चरित काव्य (रासो ग्रंथ) आते हैं।
  • चंद्रधर शर्मा गुलेरी:- गुलारी जी ने अपभ्रंश और पुरानी हिंदी को एक ही माना है तथा भाषा की दृष्टि से अपभ्रंश का समय होने का कारण उन्होने इसे “अपभ्रंश काल” का संज्ञा दी है।

निष्कर्ष:-

हिंदी साहित्य के प्रथम सोपान का नामकरण या कहें कि आदिकाल के नामकरण की समस्या पर अनेक विद्वानों ने अलग-अलग तर्कों व साक्ष्यों के आधार पर अपने-अपने मतानुसार किया है। जैसा कि उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अधिकांश विद्वान कोई सर्वमान्य नाम नहीं दे सके। वविश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस काल को ‘वीर काल’ कहा जो शुक्ल जी द्वारा प्रदत्त नाम का ही संक्षिप्त और सारगर्भित रूप है। काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित “हिन्दी साहित्य का बृहद इतिहास” में अनेक ऊहापोह के बाद ‘वीरगाथा काल’ नाम को ही उचित माना गया। अत: जब तक कोई निर्विवादित रूप से स्वीकार्य और प्रचलित नाम नहीं आता तब तक ‘वीरगाथा काल’ को ही मानना समीचीन होगा।

Tuesday, November 15, 2016

हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की प्रगति में तकनीकी का योगदान

आज का युग तकनीक का है, जिसे हम "टेक्नोयुग" भी कह सकते हैं, इसलिए आपने देखा होगा कि आज-कल हम प्रत्येक काम में टेक्नोलॉजी का भरपूर प्रयोग करते हैं। उदाहरण के तौर पर अब कोई भी पहले जैसा 25 पैसों वाला पोस्ट कार्ड या 75 पैसों वाला अंतर्देशीय पत्र खरीद कर चिट्ठियां लिखना पसंद नहीं करता है। इसकी बजाय हम मोबाइल पर एसएमएस या ई-मेल टाइप कर चुटकियों में अपना काम निपटाने में माहिर हो गए हैं। बच्चे भी आज-कल अपनी पढ़ाई ई-लर्निंग और ई-क्लासेस के माध्यम से पूरी करने लगे हैं। कुल मिला कर देखें तो हम अब टेक्निकली स्मार्ट बन गए है या स्मार्ट बनने के लिए कुछ-कुछ इस रास्ते पर चल पड़े हैं। खास बात ये है कि इन सब में हमारी नई पीढ़ी हमसे अधिक तेजी से दौड़ रही है।


आइए अब इसी तकनीक को थोड़ा भाषा के साथ जोड़कर भी देखते हैं। आज कल हम सभी कंप्यूटर पर आसानी से टाइपिंग कर लेते है, जैसे ई मेल भेजना, फेसबुक स्टेटस अपडेट करना या चैटिंग करना आदि। मुझे याद है जब सबसे पहले मैंने कंप्यूटर पर अपना नाम टाइप करके देखा था तब मैंने अंग्रेजी में ही किया था। क्योंकि, हिंदी या मराठी में यह सुविधा उपलब्ध होगी ही नहीं यह मानकर हमने कंप्यूटर और मोबाइल पर अंग्रेजी की-बोर्ड को देखकर अंग्रेजी में ही काम करना शुरू किया था। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए वैसे-वैसे तकनीकी की नई-नई बातें पता चलती गईं। वर्ष 2007 में जब मैंने खादी और ग्रामोद्योग के चंडीगढ़ स्थित कार्यालय में कनिष्ठ हिंदी अनुवादक के रूप में काम करना शुरू किया तब सबसे पहले मैंने हिंदी में कंप्यूटर पर काम करना आरम्भ किया। आगे जब मुंबई के मुख्यालय में मेरा स्थानांतरण हुआ तब वर्ष 2010 में सबसे पहले यह पता चला की हिंदी (देवनागरी) के फॉन्ट दो प्रकार के होते हैं- यूनिकोड फॉन्ट और नॉन-यूनिकोड फॉन्ट। इसके बाद मुझे "माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैग्वेज इनपुट टूल" के बारे में पता चला जो विंडोज एक्सपी और वि‍डोंज-7 पर चलता था। बाद में बैंक में पोस्टिंग मिलने पर कंप्यूटर पर अनिवार्य तौर से यूनिकोड में काम करना शुरू किया। इसके बाद कंप्यूटर पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में काम कैसे करें, इसपर मुझे अधिक जानकारी मिलनी शुरू हुई। माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैंग्वेज इनपुट टूल की सहायता से कोई भी व्यक्ति हिंदी या अन्य भारतीय भाषओं में आसानी से काम कर सकता है। यह टूल सभी एप्लिकेशनों पर सफलता पूर्वक कार्य करता हैं, और अंग्रेजी कीबोर्ड ले-आउट होने के कारण प्रयोग करने में भी सरल है। इसके बाद गूगल हिंदी इनपुट जो अंग्रेजी कीबोर्ड की सहायता से चलता हैं, के बारे में पता चला। फिर इनस्‍क्रिप्ट और बाराह आदि की जानकारी से कंप्यूटर पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध विविध तकनीकी सुविधाओं के बारे में पता चला।


हिंदी भाषा की वि‍शेषता यह हैं कि यह एक सर्वसमावेशी भाषा हैं, इसमें संस्‍कृत से लेकर भारत की प्रांतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी जैसी वि‍देशी भाषाओं के शब्‍दों को भी अपने अंदर समाहित करने की क्षमता है। तकनीकी के इस युग में हिंदी ने भी अपने परंपरागत स्वरूप को समय के अनुरूप ढाल लि‍या है। कंप्‍यूटर के साथ हिंदी भाषा ने अब चोली-दामन का साथ बना लि‍या है। आज तकनीक के प्रत्‍येक क्षेत्र में हिंदी को अपनाना आसान हो गया हैं। टाइपिंग की सुवि‍धा से लेकर वॉइस टाइपिंग की सभी सुवि‍धाऐं आज उपलब्‍ध है। आवश्‍यकता केवल हिंदी भाषा के उपयोगकर्ताओं द्वारा इन नवीनतम तकनीकी सुविधाओं को अपनाने भर की है। ओसीआर अर्थात ऑप्‍टीकल कैरेक्‍टर रिकग्नीशन अर्थात प्रकाश पुंज द्वारा वर्णों की पहचान कर पूराने देवनागरी हिंदी टेक्‍स को युनि‍कोड फॉंन्‍ट में परि‍वर्ति‍त करने की सुवि‍धा से पूरानी कि‍ताबों का डि‍जीटलाइजेशन करने में मदद मिल रही है। इससे संस्‍कृत भाषा में लि‍खे गये लेख सामग्री को आसानी से हिंदी के युनि‍कोड फॉन्‍ट में परि‍वर्ति‍त कि‍या जा सकता हैं। इस तकनीकी से पूराने शास्‍त्र, ग्रंथों के डि‍जीटलाइजेशन से ज्ञान के नए डिजिटल स्रोत खुल रहे हैं। प्राचीन ग्रंथों की दूर्लभ प्रति‍यों का डि‍जीटलाइजेशन करने से उनमें उपलब्‍ध ज्ञान का फायदा सभी को होगा।
भारत सरकार ने हिंदी में वि‍ज्ञान तथा तकनीकी साहि‍त्‍य और शब्‍दावलि‍याँ उपलब्‍ध कराने के उद्देश्य से वैज्ञानि‍क एवं तकनीकी शब्‍दावली आयोग (CSTT) की स्‍थापना की है। जि‍सका प्रमुख कार्य ज्ञान-वि‍ज्ञान तथा तकनीकी के विभिन्न क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाले शब्‍दों के हिंदी पर्याय उपलब्‍ध कराना और तत्संबंधी शब्‍दकोशों का नि‍र्माण करना है। यह आयोग हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में वैज्ञानि‍क तथा तकनीकी शब्‍दावली के वि‍कास और समन्‍वय से संबंधि‍त सि‍द्धांतों के वर्णन और कार्यान्वयन का कार्य भी करता है। आयोग द्वारा तैयार की गई शब्‍दावलि‍यों को आधार मानकर वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों की मानक पुस्‍तकों और वैज्ञानि‍क तथा तकनीकी शब्‍दकोशों का नि‍र्माण करने और उनके प्रकाशन कार्य भी किया जाता है। इस साथ ही उत्‍कृष्‍ट गुणवत्‍ता की पुस्‍तकों का अनुवाद भी कि‍या जाता हैं।

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यह लेख स्‍टेट बैंक ऑफ मैसूर, हुब्‍बल्‍ली, कर्नाटक में उप प्रबंधक (राजभाषा) के पद कार्यरत श्री राहुल खटे || RAHUL KHATE जी द्वारा लिखा गया है। आप श्री राहुल खटे से उनके Facebook वाल या उनकी वेबसाइट www.rahulkhate.online के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

नोट: आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। Hindi e-Tools || हिंदी ई-टूल्स का इनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।