Phonetic typing in Indian Languages

Speech to Text Typing | बोलकर कीजिए टाइप

Click on the microphone icon and begin speaking.

Press Control-C [Command-C on Mac] to copy text.
  

Wednesday, March 15, 2017

GMAIL में गलती से भेजे गए ईमेल को 'unsend' कैसे करें

Undo send email in Gmail

कभी-कभी जल्दबाजी में हम अचानक गलत ईमेल पते पर ईमेल भेज देते हैं या बिना File Attachment के ही भेज देते हैं। मेल भेजने के तुरंत बाद ही हमें अहसास होता है- ओह..! ये क्या हुआ..? गलत ईमेल चला गया। एसी स्थिति में खीज और पछतावे के अलावा हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता। अगर ईमेल संवेदनशील या गोपनीय हो और गलत व्यक्ति के पास चला जाए तो स्थिति और खराब हो जाती है। ऐसे में ज़रा सी चूक या लापरवाही का बड़ा ख़ामियाजा भुगतना पड़ सकता है, कई मामलों में तो बात नौकरी तक पर आ जाती है। तब हम सोचते हैं, काश! ऐसा होता कि समय रहते तुरंत ही हम उस ईमेल को 'unsend' कर पाते..!

कई ईमेल सेवा प्रदाता Send ईमेल को Undo करने का Feature उपलब्ध कराते हैं। आइए, इस लेख में हम सबसे लोकप्रिय Email सेवा प्रदाता GMAIL में उपलब्ध इस सुविधा की जानकारी प्राप्त करें। Gmail में यूजर्स के लिए ऑफिशियली यह सुविधा उपलब्ध है। अपने Gmail Account Setting में आप नीचे बताए गए तरीके के अनुसार इस फीचर को चालू कर सकते हैंः-


STEP-1:
अपने Gmail Account में Login करके दांयी तरफ ऊपर किनारे पर प्रोफाइल पिक्चर के नीचे Setting (⚙) बटन पर क्लिक करें। इसके बाद दिखाई देने वाली ड्रॉप डाउन मेन्यू लिस्ट में से पुनः Setting पर क्लिक करें।
enable undo send mail feature in gmail

STEP-2:
अब दिखाई देने वाली स्क्रीन पर General टैब पर क्लिक करके नीचे स्क्रॉल करें और  'Undo Send' विकल्प देखें। इसके सामने वाले चेक बॉक्स पर क्लिक करके Undo Send फीचर को Enable कर दें और आगे दिए गए Send cancellation period विकल्प में से अपनी सुविधा अनुसार (5- 30) सेकेंड का चयन करें। इसके बाद नीचे स्क्रॉल करके Settings को Save कर दें।

How to enable undo send mail feature in gmail

इस सुविधा को सक्रिय करने के बाद आप जब भी ईमेल भेजेंगे तो आपके ईमेल अंतिम रूप से भेजे जाने से पहले कुछ सेकेंड के लिए Save हो जाएंगे और तुरंत नहीं भेजे जाएंगे। इस दौरान आपकी स्क्रीन पर भेजे गए ईमेल को Undo करने के लिए एक संदेश दिखाई देगा।


STEP-3:
भेजे जाने वाले ईमेल को Undo करने वाला संदेश आपके द्वारा पूर्व में चयनित समय तक प्रदर्शित होगा। इस दौरान यदि आप Undo पर क्लिक कर देंगे तो आपका ईमेल भेजा नहीं जाएगा और वापस ड्राफ्ट में Save हो जाएगा।
undo sent mail in gmail

इस तरह आप जल्दबाजी में भेजे जाने वाले गलत या अवांछित ईमेल को भेजने से बच सकते हैं। निश्चय ही ये कुछ सेकेंड आपके लिए बहुमूल्य साबित हो सकते हैं।
Filed Under: ,

Saturday, March 11, 2017

Unit Converter || इकाई परिवर्तक

लंबाई (Length), तापमान (Temperature), क्षेत्रफल (Area), आयतन (Volume), वजन (Weight) और समय (Time ) आदि से संबंधित छोटी-बड़ी Units को अन्य Units में बदलने के लिए हमें कई बार एक सरल और आसान यूनिट कन्वर्टर की आवश्यकता पड़ती है। उदाहरण के लिए मीटर को किलोमीटर या सेंटीमीटर में बदलना, वर्ग मीटर को वर्ग फुट में बदलना अथवा सेल्सियस तापमान के फारेनहाइट में बदलना आदि। अब आप नीचे दिए गए Unit Converter की मदद से विभिन्न मानक इकाइयों को आपस में बदल सकते हैं।

Unit Converter || इकाई परिवर्तक

From: To:


कैसे प्रयोग करें ?

  • सबसे पहले Length, Temperature, Area, Volume, Weight या Time में से आवश्यकता अनुसार किसी एक को सलेक्ट कीजिए।
  • अब From: वाले टेक्स्ट-बॉक्स में अपनी संख्या लिखिए और उसके नीचे दी गई सूची में से आवश्यकता अनुसार किसी एक इकाई (UNIT) को सलेक्ट कीजिए।
  • अब To: वाले टेक्स्ट-बॉक्स के नीचे दी गई सूची में से उस इकाई का चयन कीजिए जिसमें आप परिवर्तन करना चाहते हैं। इसके बाद आपको वांछित परिणाम (Result) मिल जाएगा।

Unit-Converter-Image

ये भी आजमाए :

कृपया इस Unit Converter || इकाई परिवर्तक टूल के बारे में अपने बहुमूल्य सुझाव अवश्य दीजिए, जिससे कि हम इस Tool को आपके लिए और अधिक उपयोगी बना सकें।

Filed Under:

Tuesday, March 7, 2017

यूनिकोड और हिंदी में ईमेल : एक परिचय

विज्ञान और तकनीकी के वर्तमान युग में हिंदी कंप्यूटिंग की दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है। आज से कुछ वर्ष पहले जो चीजें देखने और सुनने में असंभव सी लगती थी, आज बदलते तकनीकी परिवेश में हमारी आँखों के सामने ही हकीक़त में बदल रहीं हैं। तकनीकी का पहिया इतनी तेजी से घूमा है कि भाषाई कंप्यूटिंग के क्षेत्र में एक क्रांति सी आ गई है। आज हर सॉफ्टवेयर कंपनी स्थानीयकरण (localization) की बात कर रही है। अब हर भाषा के लिए अलग–अलग सॉफ्टवेयर निर्माण करने की आवश्यकता नहीं हैं। जितनी सहजता से किसी सॉफ्टवेयर पर अंग्रेजी भाषा में काम किया जा जाता है उतनी ही सरलता और आसानी से अब दुनिया की किसी भी भाषा में काम करना संभव हो गया है। आज से लगभग एक दशक पहले अंग्रेजी के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में ईमेल भेजना कितना मुश्किल था, आज हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। किन्तु यूनिकोड जैसी नई एनकोडिंग प्रणाली के आगमन से डिजिटल कंप्यूटर की दुनिया ही बदल गई है और अब हम अपने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में बिना किसी परिवर्तन के अंग्रेजी की तरह ही हिंदी में भी आसानी से ईमेल भेज सकते हैं।

आइए हिंदी में ईमेल भेजने से संबंधित आरंभिक तकनीकी समस्याओं, सॉफ्टवेयर तथा एनकोडिंग प्रणाली आदि पर कुछ चर्चा करते हैं :-

हिन्दी ईमेल की कुछ पुरानी समस्याएँ :


ईमेल भेजने और प्राप्त करने के लिए प्रमुख रूप से दो तरह के टूल काम आते हैं, एक ईमेल क्लाईंट तथा दूसरा वेब आधारित ईमेल सर्वर। आरंभ में क्लाइंट और सर्वर सॉफ्टवेयर की सभी कोडिंग केवल ASCII (American Standard Code for Information Interchange) प्रणाली पर आधारित थी। 8bit पर आधारित इस प्रणाली में कम्प्यूटर स्क्रीन पर केवल अंग्रेजी भाषा के अक्षरों को ही प्रदर्शित किया जा सकता था। हिन्दी में ईमेल करने के लिए कुछ वर्षों पहले तक हमारे पास एक मात्र विकल्प के रूप में ऑस्की फ़ॉन्ट आधारित सेवाएँ ही थी, जिसमें हम शुषा से लेकर वेबदुनिया तक के विभिन्न फ़ॉन्ट का उपयोग कर हिन्दी में ई-मेल कर पा रहे थे। परंतु इसमें भी बहुत सी समस्याएँ थीं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :
  • ईमेल के हैडर तथा विषय को अँग्रेजी में ही लिखना होता था क्योंकि यह हिन्दी में लिखना संभव नहीं था।
  • जिसको ईमेल किया जा रहा है उसके कंप्यूटर में भी वही फ़ॉन्ट संस्थापित (Installed) होना अनिवार्य होता था, अन्यथा उस ईमेल को पढ़ पाना संभव नहीं था।
  • मूल रूप से अँग्रेजी शब्दों के साथ ही काम करने के कारण हिन्दी शब्दों के आधार पर अपने आवश्यक ईमेल को खोजने तथा सहेज कर रखने में भी समस्याएँ आतीं थीं।
  • इस प्रकार की समस्याएँ आउटलुक एक्सप्रेस तथा वेब आधारित ईमेल सेवा जैसे वेबदुनिया या रेडिफ़ मेल दोनों में ही समान रूप से आती हैं।
  • यदि ऑपरेटिंग सिस्टम यूनीकोड का समर्थन करता है तो आपका ईमेल क्लाइंट तथा ब्राउज़र भी यूनीकोड हिन्दी समर्थन प्राप्त करने वाला होना चाहिए।
Unicode and hindi email

अगला कदम और समस्याओं का समाधान :

ईमेल सेवाएं प्रमुख रूप से दो प्रकार की एनकोडिंग प्रणाली पर आधारित होतीं हैं, एक ASCII और दूसरी यूनिकोड। वर्तमान में प्रचलित अधिकांश ईमेल सेवाएं आरंभ में ASCII एनकोडिंग प्रणाली पर ही आधारित थीं। किंतु, अब समय को साथ बदलाव आया और इन कंपनियों ने यूनीकोड एनकोडिंग प्रणाली को अपनाना शुरू कर दिया। जो ईमेल सॉफ्टवेयर अर्थात क्लाइंट और सर्वर ASCII  प्रणाली पर आधारित हैं उनमें हिन्दी या किसी अन्य भाषा में ईमेल भेजना मुश्किल काम है। किन्तु, जो क्लाइंट और सर्वर यूनिकोड प्रणाली पर आधारित हैं उनमें हिन्दी में सहजता से ईमेल भेजे जा सकते हैं। यूनिकोड वास्तव में दुनिया भर की सभी भाषाओं के प्रत्येक अक्षर के लिए कंप्यूटर में एक सर्वमान्य कोड उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। अत: यूनिकोड प्रणाली में हिंदी (देवनागरी) के किसी भी अक्षर को प्रदर्शित करने के लिए जो कोड उपलब्ध कराया गया होगा वह पूरे विश्व में अंग्रेजी (ASCII) की ही तरह मानक और सर्वमान्य होगा।
  • वर्तमान में लगभग सभी प्रमुख कंपनियों यथा; माइक्रोसॉफ्ट, याहू, एप्पल, आईबीएम, गूगल आदि के सभी सॉफ्टवेयर उत्पाद यूनिकोड प्रणाली को समर्थन करने वाले बनाए जा रहे हैं। जिससे अधिकांश समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो गई हैं।
  • विंडोज़ 2000 एवं इसके बाद के सभी संस्करणों में तथा वर्ष 2002 के बाद जारी लिनक्स के लगभग सभी संस्करणों में ऑपरेटिंग सिस्टम के स्तर पर ही डिफ़ॉल्ट रूप से हिन्दी यूनीकोड के समर्थन की सुविधा उपलब्ध रहती है। इन सुविधाओं में ईमेल क्लाईंट तथा ब्राउज़र भी शामिल हैं।
  • आजकल जावा आधारित कुछ ऐसे टूल्स भी प्रचलित हैं जिनको चलाने के लिए कंप्यूटर पर किसी प्रकार के यूनीकोड समर्थन की आवश्यकता नहीं है परंतु जावा वर्चुअल मशीन संस्थापित होना आवश्यक है । जी-मेल भी जावा स्क्रिप्ट पर चलता है अर्थात इसके लिए आपके मशीन में जावा संस्थापित होना तो आवश्यक है। इसके साथ आपका ब्राउज़र भी जावा स्क्रिप्ट चलाने के लायक होना चाहिए।
  • चूंकि आमतौर पर आज सभी उपलब्ध नए ब्राउज़र जावा स्क्रिप्ट का समर्थन करते हैं। जावा स्क्रिप्ट पर आधारित होने के कारण जी-मेल के नए संस्करण को अलग से डाउनलोड करने की आवश्यकता नहीं होती है अर्थात जब भी आप जी-मेल का उपयोग करते हैं यह नवीनतम संस्करण ही रहता है।
  • कुछ पुराने सिस्टमों जैसे; विंडोज़ 98 में इंटरनेट एक्सप्लोरर 6 का पूरा पैकेज संस्थापित करने से यूनीकोड हिन्दी के आंशिक उपयोग के लायक बनाया जा सकता है।


वर्तमान में ईमेल सेवा उपलब्ध कराने वाली सभी प्रमुख कंपनियां जैसे ; जी मेल, याहू मेल, रेडिफ़ मेल, हॉट मेल आदि यूनिकोड आधारित एनकोडिंग का प्रयोग कर रही हैं। जिससे अब हिन्दी में ईमेल भेजना कोई समस्या नहीं रही है। बस आपको अपने कंप्यूटर में यूनिकोड सक्रिय करना है और हिन्दी टाइपिंग की के लिए किसी इनपुट प्रणाली (typing method) को सीखना है। हिन्दी टाइपिंग के लिए भारत सरकार ने इनस्क्रिप्ट प्रणाली को आधिकारिक रूप से मानक घोषित किया है। यह आपके कंप्यूटर में पहले से ही मौजूद है। यदि आपको इसमे टाइपिंग नहीं भी आती है तो भी आजकल हिंदी टाइपिंग कोई समस्या नहीं रही है, अब आप फोनेटिक टाइपिंग (अंग्रेजी में टाइप करके हिंदी में लिखना) से भी आसानी से लिख सकते हैं। तकनीकी तो एक कदम और आगे बढ़ चुकी है, अब आप बोलकर (वॉइस टाइपिंग) भी हिंदी में टाइप कर सकते हैं।

मित्रो ! तकनीकी रूप से तो हिंदी ईमेल भेजने से संबंधित सभी समस्याओं का लगभग समाधान हो चुका है। अब बस मानसिक समस्याएँ ही बचीं हैं और इच्छाशक्ति न होने के कारण कुछ बाधाएँ हैं। तो इन मुश्किलों को भी दूर करके आप भी हो जाइए तैयार और भेजिए हिंदी में ईमेल।
Filed Under: , ,

Monday, March 6, 2017

लिपि परिवर्तक || Script Converter Tool

You can interchange Devanagari Hindi, Bengali, Oriya, Punjabi, Gujarati, Kannada, Telugu, Malayalam, Tamil, Sinhala and Tebetan Script here.
एक आसान और बेहतरीन लिपि (Script) परिवर्तक जिसकी मदद से आप विभिन्न भारतीय लिपियों जैसे देवनागरी (हिंदी) , बंगाली, ओडिया, गुरमुखी (पंजाबी), गुजराती, कन्नड़, तेलगू, मलयालम, तमिल , सिंहली और तिब्बती आदि लिपियों को आपस में बदल सकते हैं।

लिपि परिवर्तक || All Indian Script Converter online


वांछित लिपि का चयन करें || Select Your Script
परिवर्तित लिपि || Output Script

कृपया इस Indian Scripts converter Tool के बारे में अपने बहुमूल्य सुझाव अवश्य दीजिए, जिससे कि हम इस Tool को आपके लिए और अधिक उपयोगी बना सकें।

Monday, January 9, 2017

भाषा का उद्भव और विकास....!

कई साल पहले अत्यंत प्रिय मेरी मौसी को दिल का दौरा पड़ गया। अचानक उत्पन्न यह परिस्थिति मेरे लिए वज्रपात से कम नहीं थी। मैं बुरी तरह से घबरा गया। क्योंकि मौसी मेरे दिल के सबसे  करीब थी। उनके बगैर जीवन की कल्पना भी मेरे लिए मुश्किल थी। सुखद आश्चर्य के तौर पर कुछ घंटों में ही मौसी खतरे से बाहर आ गई। थोड़े उपचार के बाद वह घर भी लौट आई। मैं फिर जीवन संघर्ष में जुट गया। लेकिन महज एक पखवाड़े के भीतर उन्हें दूसरी बार दिल का दौरा पड़ा । अपने स्वाभाव के विपरीत शुरूआती कुछ घंटे मैं सामान्य बना रहा। मुझे गलतफहमी रही कि वे जिस तरह पहली बार बीमारी के बाद वे जल्द स्वस्थ हो गई थी, इस बार भी ऐसा ही होगा। लेकिन परिदृश्य में होता निरंतर बदलाव और परिजनों की बातचीत से मुझे आभास हो गया कि अपनी सबसे प्रिय मौसी को अलविदा कहने  का समय आ गया है। इसके बाद मेरा गला रूंध गया। मुंह से शब्द निकलने बंद हो गए। लगातार दो दिनों तक बस आंखों के आंसू ही मेरी भाषा बने रहे। इसी तरह जीवन में मैंने कई बार महसूस किया है कि अचानक मिली खुशखबरी, शोक-समाचार या सुखद आश्चर्य  के चलते सबसे पहले आदमी की भाषा खो जाती है। ऐसे में हमारी भावनाएं केवल भाव-भंगिमाओं के जरिए ही अभिव्यक्त होने लगती हैं। अलग-अलग परिस्थितियों में अपनों की उपस्थिति और भाव-भंगिमाएं आदमी के दिल में उतर जातीं हैं। किसी को कुछ कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। सुख और दुख की ये परिस्थितियां बताती है कि भाषा मनुष्य के सामान्य लोक- व्यवहार के लिए एक टूल है। यह एक ऐसा माध्यम जिसके जरिए मनुष्य अपनी बात दूसरों तक पहुंचाता है।

किसी क्षेत्र की भाषा क्या होगी यह परिस्थितियों पर निर्भऱ है। क्रमिक विकास से विकसित हुई भाषाओं के बीच किसी भी रूप में अंतर विरोध नहीं है। न कोई भाषा अच्छी या बुरी कही जा सकती है। भाषा का उद्भव और विकास परिस्थितियों पर निर्भर है। मैं जिस शहर से आता हूं वहां मिश्रित आबादी है। इसलिए सभी ने सहज ही हिंदी को अपनी भाषा के तौर पर अपना लिया है। वहीं दूसरी तरह की मातृभाषाओं के लोग सहज ही उन भाषाओं को भी सीख गए जिसे बोलने वाले उनके आस-पास, शहर-मोहल्लों में रहते हैं। बेशक, इसकी शुरूआत जोर-जबरदस्ती या कुछ पाने की मंशा से नहीं हुई। लोक-व्यवहार में लोग पहले पहल हंसी-मजाक में अल्प प्रचलित भाषाओं में बोलने लगते और धीरे-धीरे  उस भाषा में काफी हद तक पारंगत हो जाते हैं। बचपन में मैं अपने पैतृक गांव जाने से इसलिए कतराता था, क्योंकि वहां की आंचलिक भाषा मेरी समझ में नहीं आती थी। इसकी वजह से मैं जितने दिन गांव में रहता, असहज बना रहता। लेकिन मजबूरी में ही सही गांव आते-जाते रहने से मैं काफी हद तक वहां की आंचलिक भाषा को समझने लगा। भले ही मैं धारा प्रवाह वहां की भाषा न बोल पाऊं। लेकिन दो लोगों की बातचीत से मैं अच्छी तरह से समझ जाता कि वे आपस में क्या बात कर रहे हैं।


भाषा का उद्भव और विकास कई बातों पर निर्भऱ हैं। अक्सर देखा गया है कि भाषा की समृद्धि काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वहां की जीवन शैली और लोक-व्यवहार कैसा है। जिस समाज में जीवन सहज-सरल है और लोग विचारशील होते हैं तो वहां की भाषा स्वतः ही मीठी और परिमार्जित होने लगती है। क्योंकि इससे जुड़े लोग भाषा के शोधन पर लगातार जोर देते रहते हैं। वहीं विषम परिस्थितियों के बीच कठोरतम दैनंदिन जीवन वाले क्षेत्र की भाषा में ठेठ और अक्खड़पन हावी रहता है। क्योंकि इस भाषा को बोलने वालों को परिस्थितियों से जूझने के बाद इतना समय नहीं मिल पाता कि वे भाषा के परिमार्जन व दूसरी बातों की ओर ध्यान दे सकें। इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि सुसंस्कृत समाज में बच्चों के नाम काफी सोच-विचार के बाद तय होते हैं। वहीं इसके विपरीत समाज में जिसने जो तय कर दिया वही बच्चों का नाम बन जाता है। बच्चों के व्यस्क होने के बाद भी कोई उनमें संशोधन या परिवर्तन की आवश्यकता महसूस नहीं करता। मसलन मैने अपने गांव में अनेक लोगों के नाम लड्डू, रसगुल्ला, लल्लू और कल्लू सुने हैं। इसलिए यह तय है कि भाषा हृदय से निकलने वाली भावना है।महज सुविधा के दृष्टिकोण से भाषाओं का उद्भव और विकास हुआ है। हर भाषा का एकमात्र उद्देश्य आदमी से आदमी को जोड़ना है। इसमें कहीं कोई अंतर-विरोध नहीं है।

कोई किसी भी भाषा को महान या दूसरी भाषाओं को तुच्छ नहीं कह सकता। हालांकि यह भी सच है कि समाज में भाषा के नाम पर अनेक लड़ाई-झगड़े हुए हैं। इसे कम या खत्म करने में तकनीकी अथवा प्रौद्योगिकी का बहुत बड़ा हाथ है। मुझे बड़ी खुशी होती है जब मैं देखता हूं कि मात्र धुन मधुर लगने पर ही लोग मोबाइल पर उन गानों को भी बार-बार सुनते हैं जो उनकी अपनी भाषा में नहीं है। कई तो ऐसे गानों को अपनी कॉलर या रिंग टोन भी बना लेते हैं। भाषाओं के मामले में उदारता का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है। शादी-समारोह में बजने वाले गीतों में भी अब भाषाई संकीर्णता कहीं नजर नहीं आती। किसी भी भाषा के गीत में रिदम और लय महसूस होते ही लोग उस पर नाचने-थिरकने लगते हैं। यही नहीं, उन्हीं गीतों को बार-बार बजाने की मांग भी अधिकारपूर्वक होती है। यह बड़ा परिवर्तन महज दो दशकों में हुआ है। आज एक ही मोबाइल में अनेक भाषाओं में लिखने और संदेश भेजने की सुविधा है। अब हर कोई इसे आत्मसात कर चुका है। कला व मनोरंजन जगत भी भाषाओं  को एक मंच पर लाने में सफल रहा है। आज टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कॉमेडी शो के जरिए हर भाषा-भाषी लोग उसका आनंद लेते हुए हंसते-खिलखिलाते हैं। कोई यह नहीं सोचता कि यह किस भाषा में पेश किया जा रहा है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि भारतीय भाषाऐं आपस में निकट आ रहीं हैं और हमारी भाषाओं का भविष्य उज्ज्वल है।

यह लेख श्री तारकेश कुमार ओझा जी द्वारा लिखा गया है। श्री ओझा जी पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और पेशे से पत्रकार हैं तथा वर्तमान में दैनिक जागरण से जुड़े हैं। इसके अलावा वे कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइटों के लिए भी स्वतंत्र रुप से लिखते रहते हैं।
संपर्कः  भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर (पं.बं.) पिनः 721301, जिला - पश्चिम मेदिनीपुर, दूरभाषः 09434453934

नोट: आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। Hindi e-Tools || हिंदी ई-टूल्स का इनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

Tuesday, January 3, 2017

भक्तिकालीन हिंदी साहित्य और तत्कालीन परिस्थितियाँ

संवत 1375-1700 वि. तक के कालखण्ड में सृजित हिंदी साहित्य में भक्ति भावना की प्रधानता होने के कारण आचार्य शुल्क ने इस काल को भक्तिकाल का नाम दिया है। प्रमुख आलोचक डा. नगेन्द्र ने इस समय सीमा को 1350-1650 ई. माना है। आदिकाल के वीरता और श्रृंगार से परिपूर्ण साहित्य से एकदम भिन्न इस काल के साहित्य में भक्ति की शान्त निर्झरिणी बहती है।


भक्तिकालील हिंदी साहित्य की परिस्थितियाँ
कोई भी साहित्यिक प्रवृत्ति यूँ ही अचानक विकसित नहीं होती, उसके पीछे कई सारे प्रमुख कारक, कई शक्तियाँ और तमाम परिस्थितियाँ सक्रिय रहती हैं। साहित्य भी इनसे अवश्य प्रभावित होता है और कालांतर में एक नया स्वरूप ग्रहण करता है। लगभग 300 वर्षों के भक्ति साहित्य का सृजन कोई सहज-सरल घटना नहीं थी। तत्कालीन इतिहास और समाज पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि इसके पीछे कोई एक नहीं बल्कि अनेक परिस्थितियां सक्रिय थीं। संक्षेप में देखें तो भक्तिकाल में निम्नलिखित परिस्थितियां सामने आती हैं -

1.     राजनीतिक परिस्थितियाँ:
  • सन 1375-1526 ई तक उत्तर भारत में तुगलक वंश, सैयद वंश, लोदी वंश, तत्पश्चात मुगल आदि अनेक राजवंशों का शासन रहा। तुगलक वंश में न्याय व्यवस्था ‘कुरान’ और ‘हदीस’ पर आधारित थी।
  • बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, और शाहजहाँ आदि का शासन भक्तिकाल की समय-सीमा में ही था। इसके अलावा कुछ वर्षों तक शेरशाह नामक अफगान का भी शासन रहा।
  • जहाँ फिरोज शाह तुगलक हिंदुओं के प्रति असहिष्णु था वहीं शेरशाह ने मालगुजारी और कर की उचित व्यवस्था की।
  • अकबर में अन्य मुगल शासकों की अपेक्षा हिन्दू जनता के प्रति अधिक सहिष्णुता थी तथा उसके शासन काल में भू-व्यवस्था में भी पर्याप्त सुधार हुआ।
  • राजनीतिक दृष्टि से यह काल हिंदुओं के परायण का काल था।
  • इस तरह देखा जाए तो भक्तिकाल के आरम्भिक दिनों में इस्लामी आक्रांताओं के आगमन से यह काल उथल-पुथल, युद्ध, संघर्ष और अशांति का काल रहा। किंतु बाद में धीरे-धीरे शांति और स्थिरता की ओर बढ़ा।
इस तरह देखा जाए तो भक्तिकाल के आरम्भिक दिनों में इस्लामी आक्रांताओं के आगमन से यह काल उथल-पुथल, युद्ध, संघर्ष और अशांति का काल था। किंतु बाद में धीरे-धीरे शांति और स्थिरता की ओर बढ़ा।

2.    सामाजिक परिस्थितियाँ:
  • भक्तिकाल में भारतीय समाज प्रमुख रूप से दो वर्गों में विभाजित था। एक वर्ग राजा, महाराजा, सेठ-साहूकार, सुल्तान तथा सामंतों आदि का था वहीं दूसरे वर्ग में किसान, मज़दूर, दलित, राज्य कर्मचारी और पारम्परिक काम धंधे में लगे लोग थे।
  • हिंदुओं में वर्ण व्यवस्था / जाति व्यवस्था अत्यंत कठोर थी और छुआछूत की भावना व्याप्त थी। इसी जाति व्यवस्था के कारण एक केन्द्रीय सत्ता होने के बावजूद भी समाज में एकता नहीं थी।
  • स्त्रियों को बहुत अधिकार नहीं मिले थे, उन्हें दोयम दर्जे का नागरिकता प्राप्त थी। सती प्रथा और पर्दा प्रथा का भी प्रचलन था।
  • इस्लाम में मौजूद समानता की भावना ने वंचित वर्ग को आकर्षित किया। इसके परिणाम स्वरूप निम्न वर्ग के लोगों में हिन्दू धर्म से इस्लाम में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ।
  • साधु सन्तों में पाखंड एवं वाह्याडम्बरों का बोलबाला था।
  • कला के क्षेत्र में हिन्दू संस्कृति पर मुस्लिम संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
  • दोनों संस्कृतियों में पारम्परिक आदान-प्रदान हुआ।
भक्तिकाल में समाज परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा था। एक तरफ परम्परावादी लोग अपनी परम्पराओं को बनाए रखने के पक्ष में थे तो दूसरी तरफ नव इस्लाम के हितैशी लोग स्वयं को प्रगतिशील बता कर समाज में बदलाव लाना चाहते थे। तत्कालीन कवियों की साहित्य सर्जना उक्त परिस्थितियों से प्रभावित थी और उनकी रचनाओं यह स्पष्ट देखा जा सकता है।


3.    धार्मिक परिस्थितियाँ:
  • वैदिक धर्म के स्वरूप में परिवर्तन हुआ तथा वैदिक कर्मकांडों की महत्ता कम हो गयी। इन्द्र, वरूण आदि अनेक वैदिक देवताओं के स्थान पर विष्णु (मूल ब्रह्म) की पूजा विभिन्न रूपों में होने लगी।
  • वैदिक धर्म के केन्द्रीय देवता इन्द्र के स्थान पर विष्णु को मुख्य शक्ति के रूप में स्थापित किया गया। आगे चलकर विष्णु के ही दो रूपों को कृष्ण और राम के स्वरूप में स्वीकारा गया और इसी से क्रमशः कृष्ण भक्ति धारा और राम भक्ति धारा की उत्पत्ति हुई।
  • बौद्ध धर्म विकृतियों के फलस्वरूप हीनयान और महायान दो शाखाओं में विभक्त हे गया।
  • महायानियों ने जनता के निम्न वर्ग को जादू-टोना, तंत्र-मंत्र के चमत्कार दिखा कर प्रभावित किया।
  • नाथों एवं सिद्धों में कर्मकांड के स्थान पर गुरु को महत्व दिया गया।
  • हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों में पूजा, नमाज, माला, तीर्थयात्रा, अज़ान, रोजा जैसे वाह्य आडंबरों की अधिकता हो गयी थी।
  • सूफियों ने हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता का आधार तैयार किया तथा समाज के सभी वर्गों में बंधुत्व की भावना का संचार किया।
  • संत कवियों ने राम के लोक रक्षक स्वरूप तथा कृष्ण के लोक रंजक स्वरूप की स्थापना की।
  • ईश्वर के सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपों को मान्यता।
दक्षिण से शुरू हुई भक्ति की लहर उत्तर भारत में भी आई और यहां इसे खुले दिल से स्वीकार भी किया गया। हिंदू और इस्लाम दोनों ही धर्मों में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों एवं बाह्याडम्बर को रोकने के लिए तत्कालीन संतों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कबीर का समाज सुधार, जायसी का प्रेम, तुलसी का समन्वयवाद तथा सूरदास द्वारा कृष्ण के लोकरंजन स्वरूप का चित्रण निश्चय ही तत्कालीन परिस्थितियों की देन है।


4.    सांस्कृतिक परिस्थितियाँ:
  • सांस्कृतिक दृष्टि से देखा जाए तो भक्तिकाल एक मिश्रित या समन्वित संस्कृति के विकास का काल है।
  • भारत में इस्लाम के आने से पहले ही कई अन्य जातियाँ का आगमन हो चुका था। इन जातियों के प्रभाव से भारत में एक मिली-जुली संस्कृति का विकास हुआ।
  • इस्लाम के आने से एक बार पुनः भारत में सांस्कृतिक संक्रमण का दौर आया और खान-पान, रहन-सहन, शिक्षा, साहित्य, स्थापत्य कला, मूर्तिकला, संगीत एवं चित्रकला में काफी बदलाव देखने को मिला।
  • विदेशी तुर्क एवं भारतीय स्थापत्य शैली के मिश्रण से गुजराती एवं जौनपुरी स्थापत्य शैली का विकास हुआ।
  • भक्तिकाल के कवियों ने भक्ति साहित्य को संगीत से जोड़ा। वे अपनी रचनाओं को गा-गाकर लोगों तक पहुँचाते थे। कुछ कवियों ने विभिन्न रागों में भी काव्य रचना की है।
  • भक्तिकाल में संगीत के साथ ही चित्रकला की भी खूब उन्नति हुई। मुगल शासकों द्वारा चित्रकला को राजाश्रय प्रदान किया गया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भक्तिकाल में पर्व-त्योहार, उत्सव, साहित्य एवं कलाओं आदि के साथ-साथ संस्कृति के लगभग सभी क्षेत्रों में आपसी समन्वय व मिश्रण के माध्यम से एक मिश्रित अथवा समन्वित संस्कृति का विकास हुआ।

निश्चय ही भक्तिकाल का साहित्य श्रेष्ठ, अनुपम एवं अद्वितीय है। हम यकीनन कह सकते हैं कि भक्तिकाल  के साहित्य को तत्कालीन परिस्थितियों ने काफी हद तक प्रभावित किया। इसी का परिणाम है कि इस काल की साहित्य रचना अपने पूर्ववर्ती वीरता और श्रृंगार से परिपूर्ण साहित्य से काफी भिन्न है। अब साहित्य में वीरता और श्रृंगार के स्थान पर भक्ति की प्रधानता हो गयी थी।