Monday, January 9, 2017

भाषा का उद्भव और विकास....!

कई साल पहले अत्यंत प्रिय मेरी मौसी को दिल का दौरा पड़ गया। अचानक उत्पन्न यह परिस्थिति मेरे लिए वज्रपात से कम नहीं थी। मैं बुरी तरह से घबरा गया। क्योंकि मौसी मेरे दिल के सबसे  करीब थी। उनके बगैर जीवन की कल्पना भी मेरे लिए मुश्किल थी। सुखद आश्चर्य के तौर पर कुछ घंटों में ही मौसी खतरे से बाहर आ गई। थोड़े उपचार के बाद वह घर भी लौट आई। मैं फिर जीवन संघर्ष में जुट गया। लेकिन महज एक पखवाड़े के भीतर उन्हें दूसरी बार दिल का दौरा पड़ा । अपने स्वाभाव के विपरीत शुरूआती कुछ घंटे मैं सामान्य बना रहा। मुझे गलतफहमी रही कि वे जिस तरह पहली बार बीमारी के बाद वे जल्द स्वस्थ हो गई थी, इस बार भी ऐसा ही होगा। लेकिन परिदृश्य में होता निरंतर बदलाव और परिजनों की बातचीत से मुझे आभास हो गया कि अपनी सबसे प्रिय मौसी को अलविदा कहने  का समय आ गया है। इसके बाद मेरा गला रूंध गया। मुंह से शब्द निकलने बंद हो गए। लगातार दो दिनों तक बस आंखों के आंसू ही मेरी भाषा बने रहे। इसी तरह जीवन में मैंने कई बार महसूस किया है कि अचानक मिली खुशखबरी, शोक-समाचार या सुखद आश्चर्य  के चलते सबसे पहले आदमी की भाषा खो जाती है। ऐसे में हमारी भावनाएं केवल भाव-भंगिमाओं के जरिए ही अभिव्यक्त होने लगती हैं। अलग-अलग परिस्थितियों में अपनों की उपस्थिति और भाव-भंगिमाएं आदमी के दिल में उतर जातीं हैं। किसी को कुछ कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। सुख और दुख की ये परिस्थितियां बताती है कि भाषा मनुष्य के सामान्य लोक- व्यवहार के लिए एक टूल है। यह एक ऐसा माध्यम जिसके जरिए मनुष्य अपनी बात दूसरों तक पहुंचाता है।

किसी क्षेत्र की भाषा क्या होगी यह परिस्थितियों पर निर्भऱ है। क्रमिक विकास से विकसित हुई भाषाओं के बीच किसी भी रूप में अंतर विरोध नहीं है। न कोई भाषा अच्छी या बुरी कही जा सकती है। भाषा का उद्भव और विकास परिस्थितियों पर निर्भर है। मैं जिस शहर से आता हूं वहां मिश्रित आबादी है। इसलिए सभी ने सहज ही हिंदी को अपनी भाषा के तौर पर अपना लिया है। वहीं दूसरी तरह की मातृभाषाओं के लोग सहज ही उन भाषाओं को भी सीख गए जिसे बोलने वाले उनके आस-पास, शहर-मोहल्लों में रहते हैं। बेशक, इसकी शुरूआत जोर-जबरदस्ती या कुछ पाने की मंशा से नहीं हुई। लोक-व्यवहार में लोग पहले पहल हंसी-मजाक में अल्प प्रचलित भाषाओं में बोलने लगते और धीरे-धीरे  उस भाषा में काफी हद तक पारंगत हो जाते हैं। बचपन में मैं अपने पैतृक गांव जाने से इसलिए कतराता था, क्योंकि वहां की आंचलिक भाषा मेरी समझ में नहीं आती थी। इसकी वजह से मैं जितने दिन गांव में रहता, असहज बना रहता। लेकिन मजबूरी में ही सही गांव आते-जाते रहने से मैं काफी हद तक वहां की आंचलिक भाषा को समझने लगा। भले ही मैं धारा प्रवाह वहां की भाषा न बोल पाऊं। लेकिन दो लोगों की बातचीत से मैं अच्छी तरह से समझ जाता कि वे आपस में क्या बात कर रहे हैं।


भाषा का उद्भव और विकास कई बातों पर निर्भऱ हैं। अक्सर देखा गया है कि भाषा की समृद्धि काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वहां की जीवन शैली और लोक-व्यवहार कैसा है। जिस समाज में जीवन सहज-सरल है और लोग विचारशील होते हैं तो वहां की भाषा स्वतः ही मीठी और परिमार्जित होने लगती है। क्योंकि इससे जुड़े लोग भाषा के शोधन पर लगातार जोर देते रहते हैं। वहीं विषम परिस्थितियों के बीच कठोरतम दैनंदिन जीवन वाले क्षेत्र की भाषा में ठेठ और अक्खड़पन हावी रहता है। क्योंकि इस भाषा को बोलने वालों को परिस्थितियों से जूझने के बाद इतना समय नहीं मिल पाता कि वे भाषा के परिमार्जन व दूसरी बातों की ओर ध्यान दे सकें। इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि सुसंस्कृत समाज में बच्चों के नाम काफी सोच-विचार के बाद तय होते हैं। वहीं इसके विपरीत समाज में जिसने जो तय कर दिया वही बच्चों का नाम बन जाता है। बच्चों के व्यस्क होने के बाद भी कोई उनमें संशोधन या परिवर्तन की आवश्यकता महसूस नहीं करता। मसलन मैने अपने गांव में अनेक लोगों के नाम लड्डू, रसगुल्ला, लल्लू और कल्लू सुने हैं। इसलिए यह तय है कि भाषा हृदय से निकलने वाली भावना है।महज सुविधा के दृष्टिकोण से भाषाओं का उद्भव और विकास हुआ है। हर भाषा का एकमात्र उद्देश्य आदमी से आदमी को जोड़ना है। इसमें कहीं कोई अंतर-विरोध नहीं है।

कोई किसी भी भाषा को महान या दूसरी भाषाओं को तुच्छ नहीं कह सकता। हालांकि यह भी सच है कि समाज में भाषा के नाम पर अनेक लड़ाई-झगड़े हुए हैं। इसे कम या खत्म करने में तकनीकी अथवा प्रौद्योगिकी का बहुत बड़ा हाथ है। मुझे बड़ी खुशी होती है जब मैं देखता हूं कि मात्र धुन मधुर लगने पर ही लोग मोबाइल पर उन गानों को भी बार-बार सुनते हैं जो उनकी अपनी भाषा में नहीं है। कई तो ऐसे गानों को अपनी कॉलर या रिंग टोन भी बना लेते हैं। भाषाओं के मामले में उदारता का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है। शादी-समारोह में बजने वाले गीतों में भी अब भाषाई संकीर्णता कहीं नजर नहीं आती। किसी भी भाषा के गीत में रिदम और लय महसूस होते ही लोग उस पर नाचने-थिरकने लगते हैं। यही नहीं, उन्हीं गीतों को बार-बार बजाने की मांग भी अधिकारपूर्वक होती है। यह बड़ा परिवर्तन महज दो दशकों में हुआ है। आज एक ही मोबाइल में अनेक भाषाओं में लिखने और संदेश भेजने की सुविधा है। अब हर कोई इसे आत्मसात कर चुका है। कला व मनोरंजन जगत भी भाषाओं  को एक मंच पर लाने में सफल रहा है। आज टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कॉमेडी शो के जरिए हर भाषा-भाषी लोग उसका आनंद लेते हुए हंसते-खिलखिलाते हैं। कोई यह नहीं सोचता कि यह किस भाषा में पेश किया जा रहा है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि भारतीय भाषाऐं आपस में निकट आ रहीं हैं और हमारी भाषाओं का भविष्य उज्ज्वल है।

यह लेख श्री तारकेश कुमार ओझा जी द्वारा लिखा गया है। श्री ओझा जी पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और पेशे से पत्रकार हैं तथा वर्तमान में दैनिक जागरण से जुड़े हैं। इसके अलावा वे कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइटों के लिए भी स्वतंत्र रुप से लिखते रहते हैं।
संपर्कः  भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर (पं.बं.) पिनः 721301, जिला - पश्चिम मेदिनीपुर, दूरभाषः 09434453934

नोट: आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। Hindi e-Tools || हिंदी ई-टूल्स का इनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।
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