Tuesday, December 27, 2016

हिंदी की दुनिया और दुनिया में हिंदी

वैश्विक स्तर पर विभिन्न भाषाओं की प्रभावशीलता से संबंधित "Power Language Index" नाम से जारी एक हालिया शोध के परिप्रेक्ष्य में हिंदी की वैश्विक स्थिति और हकीक़त से रूबरू कराता एक विश्लेषणात्कम लेख।
अभी हाल ही में एक खबर आयी थी वैश्विक स्तर पर दुनिया की सर्वाधिक प्रभावशाली 124 भाषाओं में हिंदी का 10वां स्थान है। इसमें यदि हिंदी की बोलियों और उर्दू को भी मिला दिया जाए तो यह स्थान आठवां हो जाएगा और इस तरह इस सूची में कुल 113 भाषाएं रह जाएगीं। इस खबर से सभी हिंदी प्रेमियों में उत्साह का माहौल है। भाषाओं की वैश्विक शक्ति का यह अनुमान INSEAD के प्रतिष्ठित फेलो, Dr. Kai L. Chan द्वारा मई, 2016 में तैयार किए गए पावर लैंग्वेज इन्डेक्स (Power Language Index) पर आधारित है।


इस पावर लैंग्वेज इन्डेक्स का अध्ययन करने पर चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। इंडेक्स में हिंदी की कई लोकप्रिय बोलियों को हिंदी से अलग दर्शाया गया है। 113 भाषाओं की इस सूची में हिंदी की भोजपुरी, मगही, मारवाड़ी, दक्खिनी, ढूंढाड़ी, हरियाणवी बोलियों को अलग स्थान दिया गया है। इससे पहले वीकिपीडिया और एथनोलॉग द्वारा जारी भाषाओं की सूची में भी हिंदी को इसकी बोलियों से अलग दिखाया गया था, जिसका भारत में भारी विरोध भी हुआ था। “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार हिंदी को खंडित करके देखे जाने का सिलसिला रूक नहीं रहा है। यह जानबूझ कर हिंदी को कमजोर करके दर्शाने का षड़यंत्र है और ऐसी साजिशें हिंदी की सेहत के लिए ठीक नहीं। डॉ. चैन की भाषाओं की तालिका के अनुसार, यदि हिंदी की सभी बालियों को शामिल कर लिया जाए तो हिंदी को प्रथम भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से विश्व में दूसरा स्थान दिया गया हैं। परन्तु पावर लैंग्वेज इंडेक्स में यह भाषा आठवें स्थान पर है। वहीं इंडेक्स में अंग्रेजी प्रथम स्थान पर है, जबकि अंग्रेजी को प्रथम भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से चौथा स्थान प्राप्त है।”
पावर लैंग्वेज इंडेक्स में भाषाओं की प्रभावशीलता के क्रम निर्धारण में भाषाओं के भौगोलिक, आर्थिक, संचार, मीडिया व ज्ञान तथा कूटनीतिक प्रभाव को ध्यान में रखकर अध्ययन किया गया है। जिन पांच कारकों के आधार पर ये इंडेक्स तैयार किया गया है, उनमें भौगोलिक व आर्थिक प्रभावशीलता का स्थान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यदि हिंदी से उसकी उपर्युक्त बोलियों को निकाल दिया जाए तो इसका भौगोलिक क्षेत्र बहुत सीमित हो जाएगा। भौगोलिक कारक में संबंधित भाषा को बोलने वाले देश, भूभाग और पर्यटकों के भाषायी व्यवहार को सम्मिलित किया गया है। हिंदी की लोकप्रिय बोलियों को उससे अलग दिखाने पर इन तीनों के आंकड़ों में निश्चित तौर पर कमी आएगी। भौगोलिक कारक के आधार पर हिंदी को इस सूची में 10 वां स्थान दिया गया है। डॉ. चैन के भाषायी गणना सूत्र का प्रयोग करते हुए, यदि हिंदी और उसकी सभी बोलियों के भाषाभाषियों की विशाल संख्या के अनुसार गणना की जाए तो यह स्थान निश्चित तौर पर शीर्ष पांच में आ जाएगा।
इन्डेक्स का दूसरा महत्वपूर्ण कारक आर्थिक प्रभावशीलता है। इसके अंतर्गत भाषा का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव का अध्ययन किया गया है। इसमें हिंदी को 12वां स्थान दिया गया है। इस इन्डेक्स को तैयार करने का तीसरा कारक है संचार, यानी लोगों की बातचीत में संबंधित भाषा का कितना इस्तेमाल हो रहा है। इंडेक्स का चौथा कारक अत्यंत महत्वपूर्ण है, मीडिया एवं ज्ञान के क्षेत्र में भाषा का इस्तेमाल। इसके अंतर्गत भाषा की इंटरनेट पर उपलब्धता, फिल्मों, विश्वविद्यालयों में पढ़ाई, भाषा में अकादमिक शोध ग्रंथों की उपलब्धता के आधार पर गणना की गई है। इसमें हिंदी को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ है। विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्ययन और हिंदी फिल्मों का इसमें महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी की लोकप्रियता में बॉलीवुड की वेशेष योगदान है। इंटरनेट पर हिंदी सामग्री का अभी घोर अभाव है। जहां इंटरनेट पर अंग्रेजी सामग्री की उपलब्धता 95 प्रतिशत तक है, वहीं हिंदी की उपलब्धता मात्र 0.04 प्रतिशत है। इस दिशा में हिंदी को अभी लंबा रास्ता तय करना है। इस इन्डेक्स का पांचवा और अंतिम कारक है- कूटनीतिक स्तर पर भाषा का प्रयोग। इस सूची में कूटनीतिक स्तर पर केवल 9 भाषाओं (अंग्रेजी, मंदारिन, फ्रेच, स्पेनिश, अरबी, रूसी, जर्मन, जापानी और पुर्तगाली) को  प्रभावशाली माना गया है। हिंदी सहित बाकी सभी 104 भाषाओं को कूटनीतिक दृष्टि से एक समान स्थान (10 वां स्थान) दिया गया है, यानी कि सभी कम प्रभावशाली हैं। यहों एक बात उल्लेखनीय है, जब तक वैश्विक संस्थाओं में हिंदी को स्थान नहीं दिया जाएगा तब तक इसे कूटनीति की दृष्टि से कम प्रभावशाली भाषाओं में ही शामिल किया जाता रहेगा।


उपर्युक्त पावर लैंग्वेज इंडेक्स को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि विश्व भर में अनेक स्तरों पर हिंदी को कमजोर करके देखने की कोशिश की जा रही है। हिंदी को देश के भीतर हिंदी विरोधी ताकतों से तो नुकसान पहुंचाया ही जा रहा है, देश के बाहर भी तमाम साजिशें रची जा रही हैं। दुनिया भर में अंग्रेजी के बहुत सारे रूप प्रचलित हैं, फिर भी इस इंडेक्स में उन सभी को एक ही रूप मानकर गणना की गई है। परन्तु हिंदी के साथ ऐसा नहीं किया गया है। वैसे भारत के भीतर भी तो हिंदी की सहायक बोलियां एकजुट न होकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व तलाश रही हैं और लगातार अपना संघर्ष तेज कर रही हैं। हिंदी की बोलियों की इसी आपसी फूट का फायदा साम्राज्यवादी भाषाओं द्वारा उठाया जा रहा है। आज आवश्यकता है हिंदी विरोधी इन गतिविधियों का डटकर विरोध किया जाए और इसके लिए सर्वप्रथम हमें हिंदी की बोलियों की आपसी लड़ाई को बंद करना होगा तथा सभी देशवासियों को अपने पद व हैसियत के अनुसार हिंदी की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए निरंतर योगदान देना होगा। अंततः हमारी अपनी भाषा के प्रति जागरूक होने की जिम्मेदारी भी तो हमारी अपनी ही है।

यह लेख कोल इंडिया लिमिटेड की अनुषंगी कंपनी, भारत कोकिंग कोल लिमिटेड, धनबाद में सहायक प्रबंधक (राजभाषा) के पद कार्यरत श्री दिलीप कुमार सिंह जी द्वारा लिखा गया है। आप श्री दिलीप जी से उनके Facebook वाल या Google+ के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

नोट: आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। Hindi e-Tools || हिंदी ई-टूल्स का इनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।
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Friday, December 23, 2016

हिंदी की फुल स्पीड

जब मैंने होश संभाला तो देश में हिंदी के विरोध और समर्थन दोनों का मिला-जुला माहौल था। एक बड़ी संख्या में लोग हिंदी प्रेमी थे, जो लोगों से हिंदी अपनाने की अपील किया करते थे। वहीं दक्षिण भारत के राज्यों, खासकर तमिलनाडु में हिंदी के प्रति हिंसक विरोध की खबरें भी जब-तब सुनने-पढ़ने को मिला करती थीं। हालांकि, काफी प्रयास के बावजूद उस समय इसकी वजह मेरी समझ में नहीं आती थी।

संयोगवश 80 के दशक के मध्य में तमिलनाडु समेत दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में जाने का मौका मिला, तो मुझे लगा कि राजनीति को छोड़ भी दें तो भी यहां के लोगों की हिंदी के प्रति समझ बहुत ही कम है। तब वहां बहुत कम ही लोग ऐसे हुआ करते थे जो टूटी-फूटी हिंदी में किसी सवाल का जवाब दे पाते थे। ज्यादातर ‘नो हिंदी...’ कह कर आगे बढ़ जाते। चूंकि मेरा ताल्लुक रेलवे से है, लिहाजा इसके दफ्तरों में टंगे बोर्डों पर “हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, इसे अपनाइए... दूसरों को भी हिंदी अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें” जैसे वाक्य बरबस ही मेरा ध्यान आकर्षित करते थे। सितंबर महीने में शहर के विभिन्न भागों में हिंदी दिवस पर अनेक कार्यक्रम भी होते थे। जिसमें राष्ट्रभाषा के महत्व और इसकी उपयोगिता पर लंबा-चौड़ा व्याख्यान प्रस्तुत किया जाता। हिंदी में बेहतर करने वाले पुरस्कृत भी होते। लेकिन, वाईटूके यानी 21 वीं सदी की शुरूआत से माहौल में तेजी से बदलाव होने लगा। हिंदी फिल्में तो पहले भी लोकप्रिय थी ही, 2004 तक मोबाइल की पहुंच आम आदमी तक हो गई। फिर शुरू हुआ मोबाइल पर रिंगटोन व डायलर टोन लगाने का दौर। मुझे यह देख कर सुखद आश्चर्य होता कि ज्यादातर हिंदीतर भाषियों के ऐसे टोन पर हिंदी गाने सजे होते थे। वहीं बड़ी संख्या में हिंदी भाषी अपने मोबाइल पर बांग्ला अथवा दूसरी भाषाओं के गाने रिंग या डायलर टोन के तौर पर लगाते।

इस दौर में एक बार फिर से यात्रा का संयोग बनने पर मैंने महसूस किया कि अब माहौल तेजी से बदल चुका है। देश के किसी भी कोने में हिंदी बोली और समझी जाने लगी है। और तो और आगंतुक को हिंदी भाषी जानते ही सामने वाला हिंदी में बातचीत शुरू कर देता है। 2007 तक वैश्वीकरण और बाजारवाद का प्रभाव बढ़ने पर छोटे शहरों व कस्बों तक में शापिंग मॉल व बड़े-बड़े ब्रांडों के शोरुम खुलने लगे, तो मैंने पाया कि हिंदी का दायरा अब राष्ट्रीय से बढ़ कर अंतरराष्ट्रीय हो चुका है। विदेशी कंपनिय़ों ने भी हिंदी की ताकत के आगे मानो सिर झुका दिया है। क्योंकि मॉल में प्रवेश करते ही... इससे सस्ता कुछ नहीं... मनाईए त्योहार की खुशी ... दीजिए अपनों को उपहार... जैसे रोमन में लिखे वाक्य मुझे हिंदी की शक्ति का अहसास कराते। इसी के साथ हिंदी विरोध ही नहीं हिंदी के प्रति अंध व भावुक समर्थन की झलकियां भी गायब होने लगीं। क्योंकि अब किसी को ऐसा बताने या साबित करने की जरूरत ही नहीं होती। ऐसे नजारे देख कर मैं अक्सर सोच में पड़ जाता हूं कि क्या यह सब किसी सरकारी या गैर सरकारी प्रयास से संभव हुआ है। मेरे हिसाब से तो बिल्कुल नहीं, बल्कि यह हिंदी की अपनी ताकत है जिसके बूते वह खुद की उपयोगिता साबित कर पाई। यही वजह है कि आज बड़ी संख्या में दक्षिण मूल के युवक कहते सुने जाते हैं, “यार, गुड़गांव में कुछ महीने नौकरी करने के चलते मेरी हिंदी बढ़िया हो गई है” या किसी बांग्लाभाषी सज्जन को कहते सुनता हूं, “तुम्हारी हिंदी बिल्कुल दुरुस्त नहीं है, तुम्हें यदि राज्य के बाहर नौकरी मिली तो तुम क्या करोगे? कभी सोचा है।” चैनलों पर प्रसारित होने वाले कथित टैलेंट शो में चैंपियन बनने वाले अधिकांश सफल प्रतिभागियों का अहिंदी भाषी होना भी हिंदी प्रेमियों के लिए एक सुखद अहसास है।


सचमुच राष्ट्रभाषा हिंदी के मामले में यह बहुत ही अनुकूल व सुखद बदलाव है। जो कभी हिंदी प्रेमियों का सपना था। यानी, एक ऐसा माहौल जहां न हिंदी के पक्ष में बोलने की जरूरत पड़े या न विरोध सुनने की। लोग खुद ही इसके महत्व को समझें। अपने आस-पास जो हिंदी का प्रति बदलता हुआ माहौल आज हम देख रहे हैं, ज्यादा नहीं दो दशक पहले तक उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आज के परिवेश को देखते हुए हम कह सकते हैं कि हमारी हिंदी अब ‘फुल स्पीड’ में है जो किसी के रोके कतई नहीं रुकने वाली...।

यह लेख श्री तारकेश कुमार ओझा जी द्वारा लिखा गया है। श्री ओझा जी पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और पेशे से पत्रकार हैं तथा वर्तमान में दैनिक जागरण से जुड़े हैं। इसके अलावा वे कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइटों के लिए भी स्वतंत्र रुप से लिखते रहते हैं।
संपर्कः  भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर (पं.बं.) पिनः 721301, जिला - पश्चिम मेदिनीपुर, दूरभाषः 09434453934

नोट: आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। Hindi e-Tools || हिंदी ई-टूल्स का इनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

Thursday, November 24, 2016

हिंदी साहित्य का आदिकाल : नामकरण और औचित्य

हिंदी साहित्य को एक व्यवस्थित स्वरूप में प्रस्तुत करने के उद्देश्य से विद्वानों ने साहित्य के इतिहास को कई काल-खण्डों में विभाजित किया है। साहित्य के काल विभाजन के बाद अध्ययन की सुविधा को ध्यान में रखते हुए तथा तत्कालीन प्रवृत्तियों व समय के अनुरूप प्रत्येक काल-खण्ड को एक अलग नाम दिया गया, यथा- आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल व आधुनिक काल आदि। हिंदी साहित्य के काल विभाजन एवं नामकरण के पीछे विभिन्न विद्वानों द्वारा अपने-अपने विचार रखते हुए उसके औचित्य को सिद्ध करने के प्रयास किए गए।


आइए, इस आलेख में हम हिंदी साहित्य के “आदिकाल के नामकरण और उसके औचित्य” के संबंध में हिंदी के कुछ प्रमुख आलोचकों और विद्वानों के विचारों और सिद्धांतों को जानने व समझने की कोशिश करते हैं -

आचार्य शुक्ल का नामकरण:-

  • 1929 ई. में प्रकाशित तथा शुक्ल जी द्वारा लिखित प्रथम तर्क संगत एवं अधिकांश विद्वानों द्वारा प्रमाणित “हिन्दी साहित्य का इतिहास” में आदिकाल (1050- 1375 ई.) को “वीरगाथा काल” नाम दिया गया ।
  • इस नामकरण का मुख्य आधार उस समय “वीरगाथाओं की प्रचुरता और उनकी लोकप्रियता” को माना गया।

साहित्य सामाग्री:-

शुक्ल जी ने “वीरगाथा काल” नामकरण के लिए निम्नलिखित 12 रचनाओं को आधारभूत साहित्य सामग्री के रूप में स्वीकार किया:-

क्र. सं. रचना का नाम रचनाकार रचनाकाल टिप्पणी
1. विजयपाल रासो नल्ल सिंह 1350 वि. मिश्र बंधुओं ने समय 1355 वि. माना है
2. हमीर रासो शारंगधर 1350 वि. यह ग्रंथ आधा ही प्राप्त है
3. कीर्ति लता विद्यापति 1460 वि. समय सीमा से बाहर
4. कीर्ति पताका विद्यापति 1460 वि. समय सीमा से बाहर
5. खुमान रासो दलपति विजय 1290 वि. मोतीलाल मेनारिया ने इसका समय 1545 वि. माना है
6. बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह 1292 वि. प्रामाणिकता संदिग्ध है
7. प्रथ्वीराज रासो चंद्रबरदाई 1225-40 वि. स्वयं शुक्ल जी ने इस ग्रंथ के अर्ध-प्रामाणिक माना है
8. जयचंद्र प्रकाश भट्ट केदार 1225 वि. रचना अप्राप्त है, उल्लेख मात्र मिलता है
9. जयमयंक जस चन्द्रिका मधुकर कवि 1240 वि. रचना अप्राप्त है, उल्लेख मात्र मिलता है
10. परमाल रासो जगनिक 1230 वि. मूलरूप अज्ञात
11. खुसरो की पहेलियां अमीर खुसरो 1350 वि. वीरगाथाओं की परिपाटी से विचलन
12. विद्यापति पदावली विद्यापति 1460 वि. समय सीमा से बाहर
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में:- “इसी संक्षिप्त सामाग्री को लेकर थोड़ा-बहुत विचार हो सकता है, इसी पर हमें संतोष करना पड़ता है।

शुक्ल जी के नामकरण की आलोचना:-

शुक्ल जी द्वारा आदिकाल का नामकरण वीरगाथा काल के रूप में किए जाने के संबंध में विभिन्न विद्वानों में मतभेद रहे हैं। इस बारे में कुछ प्रमुख विद्वानों के मत निम्नानुसार हैं:-
  • शुक्ल जी ने अनेक रचनाओं को अपभ्रंश की कहकर हिन्दी के खाने से अलग कर दिया है। जबकि स्वयं उनके द्वारा चुनी गई 12 राचनाओं में प्रथम 4 अपभ्रंश की ही शामिल हैं।
  • पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी के अनुसार “अपभ्रंश मिश्रित हिंदी ही पुरानी हिंदी है।
  • डॉ. त्रिगुणायत के अनुसार “अपभ्रंश मिश्रित तमाम रचनाएँ, जिनके संबंध में कुछ विद्वानों को अपभ्रंश की होने का भ्रम हो गया है, पुरानी हिंदी की रचनाएँ ही मानी जाएंगी।"
  • राहुल सांकृत्यायन हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि के अनुसार 850 वि. के आस-पास उपलब्ध अपभ्रंश की मानी जानी वाली रचनाएँ, हिन्दी के आदिकाल की सामाग्री के रूप में हैं। इसी आधार पर सिद्ध सरहपा को हिन्दी का प्रथम कवि माना जाएगा।

विभिन्न विद्वानों द्वारा दिए गए नाम और उनका औचित्य:-

हिंदी साहित्य के प्रथम पड़ाव अर्थात आदिकाल को विभिन्न विद्वानों द्वारा कई अलग-अलग नामों से अभिहित किया गया है। आदिकाल के के नामकरण के संबंध में कुछ प्रमुख विद्वानों के मत निम्नानुसार हैं -
  • आचार्य शुक्ल:- वीरगाथाओं की प्रचुरता और लोकप्रियता के आधार पर “वीरगाथा काल” नाम दिया।
  • डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी:- द्विवेदी जी के अनुसार वीरगाथा नाम के लिए कई आधार ग्रंथ महत्वपूर्ण और लोकप्रिय नहीं हैं तथा कइयों की प्रामाणिकता, समयसीमा आदि विवादित है। अत: “आदिकाल” नाम ही उचित है, क्योंकि साहित्य की दृष्टि से यह काल अपभ्रंश काल का विकास ही है।
  • रामकुमार वर्मा:- रामकुमार वर्मा ने इसे “चारण काल” कहा। उनके अनुसार इस काल के अधिकांश कवि चारण अर्थात राज-दरबारों के आश्रय में रहने वाले व सम्राटों का यशगान करने वाले ही थे।
  • महावीर प्रसाद द्विवेदी:- आरम्भिक अवस्था या कहें कि हिंदी साहित्य के बीज बोने की समयावधि के आधार पर महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने इस काल को “बीज-वपन काल” कहा। वैसे यह नाम भी आदिकाल का ध्योतक है।
  • राहुल सांकृत्यायन:- सिद्ध सामंत युग, उनके अनुसार 8वीं से 13 वीं शताब्दी के काव्य में दो प्रवृत्तियां प्रमुख हैं- 1.सिद्धों की वाणी- इसके अंतर्गत बौद्ध तथा नाथ-सिद्धों की तथा जैन मुनियों की उपदेशमूलक तथा हठयोग से संबंधित रचनाएँ हैं। 2.सामंतों की स्तृति- इसके अंतर्गत चारण कवियों के चरित काव्य (रासो ग्रंथ) आते हैं।
  • चंद्रधर शर्मा गुलेरी:- गुलारी जी ने अपभ्रंश और पुरानी हिंदी को एक ही माना है तथा भाषा की दृष्टि से अपभ्रंश का समय होने का कारण उन्होने इसे “अपभ्रंश काल” का संज्ञा दी है।

निष्कर्ष:-

हिंदी साहित्य के प्रथम सोपान का नामकरण या कहें कि आदिकाल के नामकरण की समस्या पर अनेक विद्वानों ने अलग-अलग तर्कों व साक्ष्यों के आधार पर अपने-अपने मतानुसार किया है। जैसा कि उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अधिकांश विद्वान कोई सर्वमान्य नाम नहीं दे सके। वविश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इस काल को ‘वीर काल’ कहा जो शुक्ल जी द्वारा प्रदत्त नाम का ही संक्षिप्त और सारगर्भित रूप है। काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित “हिन्दी साहित्य का बृहद इतिहास” में अनेक ऊहापोह के बाद ‘वीरगाथा काल’ नाम को ही उचित माना गया। अत: जब तक कोई निर्विवादित रूप से स्वीकार्य और प्रचलित नाम नहीं आता तब तक ‘वीरगाथा काल’ को ही मानना समीचीन होगा।

Tuesday, November 15, 2016

हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की प्रगति में तकनीकी का योगदान

आज का युग तकनीक का है, जिसे हम "टेक्नोयुग" भी कह सकते हैं, इसलिए आपने देखा होगा कि आज-कल हम प्रत्येक काम में टेक्नोलॉजी का भरपूर प्रयोग करते हैं। उदाहरण के तौर पर अब कोई भी पहले जैसा 25 पैसों वाला पोस्ट कार्ड या 75 पैसों वाला अंतर्देशीय पत्र खरीद कर चिट्ठियां लिखना पसंद नहीं करता है। इसकी बजाय हम मोबाइल पर एसएमएस या ई-मेल टाइप कर चुटकियों में अपना काम निपटाने में माहिर हो गए हैं। बच्चे भी आज-कल अपनी पढ़ाई ई-लर्निंग और ई-क्लासेस के माध्यम से पूरी करने लगे हैं। कुल मिला कर देखें तो हम अब टेक्निकली स्मार्ट बन गए है या स्मार्ट बनने के लिए कुछ-कुछ इस रास्ते पर चल पड़े हैं। खास बात ये है कि इन सब में हमारी नई पीढ़ी हमसे अधिक तेजी से दौड़ रही है।


आइए अब इसी तकनीक को थोड़ा भाषा के साथ जोड़कर भी देखते हैं। आज कल हम सभी कंप्यूटर पर आसानी से टाइपिंग कर लेते है, जैसे ई मेल भेजना, फेसबुक स्टेटस अपडेट करना या चैटिंग करना आदि। मुझे याद है जब सबसे पहले मैंने कंप्यूटर पर अपना नाम टाइप करके देखा था तब मैंने अंग्रेजी में ही किया था। क्योंकि, हिंदी या मराठी में यह सुविधा उपलब्ध होगी ही नहीं यह मानकर हमने कंप्यूटर और मोबाइल पर अंग्रेजी की-बोर्ड को देखकर अंग्रेजी में ही काम करना शुरू किया था। लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए वैसे-वैसे तकनीकी की नई-नई बातें पता चलती गईं। वर्ष 2007 में जब मैंने खादी और ग्रामोद्योग के चंडीगढ़ स्थित कार्यालय में कनिष्ठ हिंदी अनुवादक के रूप में काम करना शुरू किया तब सबसे पहले मैंने हिंदी में कंप्यूटर पर काम करना आरम्भ किया। आगे जब मुंबई के मुख्यालय में मेरा स्थानांतरण हुआ तब वर्ष 2010 में सबसे पहले यह पता चला की हिंदी (देवनागरी) के फॉन्ट दो प्रकार के होते हैं- यूनिकोड फॉन्ट और नॉन-यूनिकोड फॉन्ट। इसके बाद मुझे "माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैग्वेज इनपुट टूल" के बारे में पता चला जो विंडोज एक्सपी और वि‍डोंज-7 पर चलता था। बाद में बैंक में पोस्टिंग मिलने पर कंप्यूटर पर अनिवार्य तौर से यूनिकोड में काम करना शुरू किया। इसके बाद कंप्यूटर पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में काम कैसे करें, इसपर मुझे अधिक जानकारी मिलनी शुरू हुई। माइक्रोसॉफ्ट इंडिक लैंग्वेज इनपुट टूल की सहायता से कोई भी व्यक्ति हिंदी या अन्य भारतीय भाषओं में आसानी से काम कर सकता है। यह टूल सभी एप्लिकेशनों पर सफलता पूर्वक कार्य करता हैं, और अंग्रेजी कीबोर्ड ले-आउट होने के कारण प्रयोग करने में भी सरल है। इसके बाद गूगल हिंदी इनपुट जो अंग्रेजी कीबोर्ड की सहायता से चलता हैं, के बारे में पता चला। फिर इनस्‍क्रिप्ट और बाराह आदि की जानकारी से कंप्यूटर पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में उपलब्ध विविध तकनीकी सुविधाओं के बारे में पता चला।


हिंदी भाषा की वि‍शेषता यह हैं कि यह एक सर्वसमावेशी भाषा हैं, इसमें संस्‍कृत से लेकर भारत की प्रांतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी जैसी वि‍देशी भाषाओं के शब्‍दों को भी अपने अंदर समाहित करने की क्षमता है। तकनीकी के इस युग में हिंदी ने भी अपने परंपरागत स्वरूप को समय के अनुरूप ढाल लि‍या है। कंप्‍यूटर के साथ हिंदी भाषा ने अब चोली-दामन का साथ बना लि‍या है। आज तकनीक के प्रत्‍येक क्षेत्र में हिंदी को अपनाना आसान हो गया हैं। टाइपिंग की सुवि‍धा से लेकर वॉइस टाइपिंग की सभी सुवि‍धाऐं आज उपलब्‍ध है। आवश्‍यकता केवल हिंदी भाषा के उपयोगकर्ताओं द्वारा इन नवीनतम तकनीकी सुविधाओं को अपनाने भर की है। ओसीआर अर्थात ऑप्‍टीकल कैरेक्‍टर रिकग्नीशन अर्थात प्रकाश पुंज द्वारा वर्णों की पहचान कर पूराने देवनागरी हिंदी टेक्‍स को युनि‍कोड फॉंन्‍ट में परि‍वर्ति‍त करने की सुवि‍धा से पूरानी कि‍ताबों का डि‍जीटलाइजेशन करने में मदद मिल रही है। इससे संस्‍कृत भाषा में लि‍खे गये लेख सामग्री को आसानी से हिंदी के युनि‍कोड फॉन्‍ट में परि‍वर्ति‍त कि‍या जा सकता हैं। इस तकनीकी से पूराने शास्‍त्र, ग्रंथों के डि‍जीटलाइजेशन से ज्ञान के नए डिजिटल स्रोत खुल रहे हैं। प्राचीन ग्रंथों की दूर्लभ प्रति‍यों का डि‍जीटलाइजेशन करने से उनमें उपलब्‍ध ज्ञान का फायदा सभी को होगा।
भारत सरकार ने हिंदी में वि‍ज्ञान तथा तकनीकी साहि‍त्‍य और शब्‍दावलि‍याँ उपलब्‍ध कराने के उद्देश्य से वैज्ञानि‍क एवं तकनीकी शब्‍दावली आयोग (CSTT) की स्‍थापना की है। जि‍सका प्रमुख कार्य ज्ञान-वि‍ज्ञान तथा तकनीकी के विभिन्न क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाले शब्‍दों के हिंदी पर्याय उपलब्‍ध कराना और तत्संबंधी शब्‍दकोशों का नि‍र्माण करना है। यह आयोग हिंदी और अन्‍य भारतीय भाषाओं में वैज्ञानि‍क तथा तकनीकी शब्‍दावली के वि‍कास और समन्‍वय से संबंधि‍त सि‍द्धांतों के वर्णन और कार्यान्वयन का कार्य भी करता है। आयोग द्वारा तैयार की गई शब्‍दावलि‍यों को आधार मानकर वि‍भि‍न्‍न वि‍षयों की मानक पुस्‍तकों और वैज्ञानि‍क तथा तकनीकी शब्‍दकोशों का नि‍र्माण करने और उनके प्रकाशन कार्य भी किया जाता है। इस साथ ही उत्‍कृष्‍ट गुणवत्‍ता की पुस्‍तकों का अनुवाद भी कि‍या जाता हैं।

भारत की राजभाषा हिंदी को डिजिटल दुनियां में समृद्ध करने और बढावा देने में ऑनलाइन हिंदी पुस्तकों की महत्वपू्र्ण भूमिका सामने आ रही है। गूगल बुक्स और किंडल बुक्स आदि ऑनलाईन सुवि‍धाओं की सहायता से आप अपने कंप्यूटर या मोबाइल फोन पर हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं की हजारों पुस्तकों को मुफ्त में अथवा पैसों का भुगतान करके पढ़ सकते हैं। गूगल बुक्स पर उपलब्ध पुस्‍तकों को आप कंप्‍यूटर या अपने लैपटॉप पर गूगल डाउनलोडर की सहायता से पीडीएफ फाईल में भी डाउनलोड करके रख सकते हैं। गूगल वॉइस टाइपिंग सेवा की सहायता से आप बोलकर टाइप कर सकते हैं। इस सुवि‍धा से हिंदी टाइपिंग के लि‍ए लगने वाले समय में काफी बचत हुई है। एन्ड्रॉइड मोबाइल पर हिंदी की ऑफलाइन शब्दावली सुवि‍धा अंग्रेजी और अन्‍य वि‍देशी भाषाओं के शब्‍दों के हिंदी शब्‍दार्थ ढूंढने में सहायक है। भाषा प्रौद्योगिकी तथा नित नई विकसित होने वाली तकनीकों से हिंदी के वि‍कास को और भी गति मि‍लेगी।

यह लेख स्‍टेट बैंक ऑफ मैसूर, हुब्‍बल्‍ली, कर्नाटक में उप प्रबंधक (राजभाषा) के पद कार्यरत श्री राहुल खटे || RAHUL KHATE जी द्वारा लिखा गया है। आप श्री राहुल खटे से उनके Facebook वाल या उनकी वेबसाइट www.rahulkhate.online के माध्यम से संपर्क कर सकते हैं।

नोट: आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। Hindi e-Tools || हिंदी ई-टूल्स का इनसे सहमत होना अनिवार्य नहीं है।

Friday, October 28, 2016

कंप्यूटर पर ऑफलाइन वॉइस टाइपिंग, बिना क्रोम ब्राउज़र के

आजकल Google Voice Typing प्रणाली बहुत लोकप्रिय हो रही है। किंतु सभी लोगों को इसका पूरा-पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। अभी तक वॉइस टाइपिंग की सुविधा का सर्वाधिक फायदा केवल Android Smart Phone रखने वाले लोग ही उठा पा रहे हैं। Windows या Linux कंप्यूटर पर बोलकर टाइप करने में अभी भी बहुत दिक्कतें हैं, जैसे :–
  1. यह सुविधा केवल क्रोम ब्राउज़र में ही उपलब्ध है।
  2. Google doc में टाइप करने के लिए आपके पास जीमेल खाता होना जरूरी है।
  3. सबसे महत्वपूर्ण, आप बिना इंटरनेट अर्थात ऑफलाइन माध्यम से वॉइस टाइपिंग नहीं कर सकते हैं।
यूं तो गूगल ने Android Phone पर ऑफलाइन माध्यम से हिंदी सहित कई भाषाओं में बोलकर टाइप करने की सुविधा उपलब्ध करा दी है। किंतु, कंप्यूटर पर अभी यह सुविधा ऑनलाइल माध्यस से ही उपलब्ध है और उसकी भी अपनी अनेक सीमाएं हैं।

तो आइए ! आज हम उपर्युक्त सभी सीमाओं को तोड़ते हैं और अपने Windows या Linux कंप्यूटर पर बिना क्रोम ब्राउज़र, बिना जीमेल खाता और बिना इंटरनेट के कुछ Software/ e-tools की मदद से आसानी से बोलकर टाइप करना सीखते हैं। सबसे खास बात है कि हम Google Doc में नहीं बल्कि MS Word या इसी तरह के किसी भी अन्य एप्लीकेशन में ऑफलाइन माध्यम से बोलकर टाइप करेंगे।


मैं आपको पहले ही बता चुका हूं कि Google ने एंड्रॉइड फोन पर ऑफलाइल वॉइस टाइपिंग की सुविधा उपलब्ध करा दी है। बस हम इसी की सहायता से अपने कंप्यूटर पर ऑफलाइन हिंदी वॉइस टाइपिंग करेंगे, अर्थात अपने Android फोन में उपलब्ध ऑफलाइन वॉइस टाइपिंग डाटाबेस/ लैंग्वेज पैक का इस्तेमाल करके अपने कंप्यूटर पर हिंदी में बोलकर टाइप करेंगे। इसके लिए आपको Intel के निम्नलिखित दो सॉफ्टवेयर/ एप्लीकेशन डाउनलोड करने होंगे -
  1. Intel® Remote Keyboard mobile app - इसे Google Play Store से डाउनलोड करके अपने एंड्रॉइड फोन (Android 4.0 and later) में इंस्टॉल कर लें। डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें। 
  2. Intel® Remote Keyboard host app - इसे Intel® Download Center से डाउनलोड करके अपने विंडोज (Windows 8.1 and later) या लिनक्स (coming in late 2015) कंप्यूटर पर इंस्टॉल कर लें। डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

प्रयोग विधि (User Guide) :

STEP-1:

जैसे ही आप अपने कंप्यूटर पर Intel® Remote Keyboard host app को सफलता पूर्वक इंस्टॉल कर लेंगे, आपको सिस्टम ट्रे में नीचे दिखाए गए चित्र जैसा एक आइकन दिखाई देने लगेगा।



इसके अलावा एंड्रॉइड फोन में Intel® Remote Keyboard mobile app इंस्टॉल करने के बाद मोबाइल की स्क्रीन पर कुछ इस प्रकार का आइकन दिखाई देगा।


STEP-2:

अब आपको अपने एंड्रॉइड मोबाइल फोन में ऑफलाइन हिंदी वॉइस टाइपिंग की सुविधा एक्टिवेट कर लेनी है। एंड्रॉइड मोबाइल फोन में ऑफलाइन हिंदी वॉइस टाइपिंग एक्टिवेट कैसे करें, यह जानने के लिए आप यहां क्लिक करके यह वीडियो देख सकते हैं।

STEP-3:

मोबाइल फोन में ऑफलाइन हिंदी वॉइस टाइपिंग एक्टिवेट करने के बाद अपने एंड्रॉइड फोन और कंप्यूटर को किसी एक ही कॉमन WiFi नेटवर्क (मोबाइल या कंप्यूटर/ लैपटॉप का Hotspot अथवा कोई भी अन्य कॉमन नेटवर्क) के माध्यम से आपस में जोड़ना है। ध्यान दें, यहाँ WiFi में इंटरनेट डाटा का सक्रिय होना जरूरत नहीं है। इसके लिए Internet data की कोई आवश्यकता नहीं है, WiFi नेटवर्क का प्रयोग कंप्यूटर और एंड्रॉइड फोन को मात्र आपस में कनेक्ट करने के लिए किया जा रहा है ताकि हम अपने Android फोन में उपलब्ध ऑफलाइन वॉइस टाइपिंग डाटाबेस/ लैंग्वेज पैक का इस्तेमाल अपने कंप्यूटर पर वॉइस टाइपिंग के लिए कर सकें।


STEP-4:  एंड्रॉइड फोन और कंप्यूटर को आपस में जोड़ना
  1. अपने फोन और कंप्यूटर को आपस में जोड़ने से पहले सुनिश्चित करें कि:-
    • आपके कंप्यूटर पर सिस्टम ट्रे में (ऊपर बताए गए अनुसार) Intel® Remote Keyboard host app का आइकन दिखाई दे रहा है।
    • आपका एंड्रॉइड फोन और कंप्यूटर किसी एक ही कॉमन WiFi नेटवर्क से आपस में कनेक्टेड हैं।
  2. अब आप अपने मोबाइल फोन के Intel® Remote Keyboard mobile app को टैप करके चालू कर लें। जैसे ही मोबाइल एप चालू होगा, फोन की स्कीन पर डिवाइस लिस्ट में आपके कॉमन wifi से जुड़े कंप्यूटर (एक से अधिक भी हो सकते हैं) का विवरण दिखाई देने लगेगा।
  3. जिस कंप्यूटर से आपको Remote Keyboard mobile app से जोड़ना है डिवाइस लिस्ट में उसके नाम पर टैप /टच करके Pairing process आरम्भ कर दीजिए।
  4. पहली बार पेयरिंग करने के पर आपके कंप्यूटर की स्क्रीन पर एक QR code दिखाई देगा, जिसे अपने मोबाइल के कैमरे से स्कैन करके कंप्यूटर और मोबाइल को आपस में कनेक्ट करना होगा।
  5. कंप्यूटर और मोबाइल के आपस में कनेक्ट होते ही आपके मोबाइल फोन पर नीचे दिखाए गए चित्र के जैसी एक स्क्रीन दिखाई देने लगेगी, जिसके द्वारा आपका कंप्यूटर नियंत्रित किया जा सकता है। इसका मतलब है, अब आप अपने मोबाइल की स्क्रीन से वो सारे काम कर सकते हैं जो कंप्यूटर के मूल माउस और कीबोर्ड से किए जातें हैं। जी हां, टाइपिंग भी !

अधिक स्पष्ट और आसानी से समझने के लिए यह यूट्यूब वीडियो देखिए :


इस तरह अब आप android फोन में उपलब्ध ऑफलाइन वॉइस टाइपिंग डाटाबेस/ लैंग्वेज पैक का इस्तेमाल करके अपने कंप्यूटर पर MS Word आदि में ऑफलाइन वॉइस टाइपिंग करने के लिए तैयार हैं। बस कंप्यूटर पर MS Word की कोई नई फाइल खोलिए तथा अपने मोबाइल में ऑन Intel® Remote Keyboard app की स्क्रीन पर ऊपर की तरफ दिखाई दे रहे कीबोर्ड आइकन पर क्लिक करके Android मोबाइल का कीबोर्ड सक्रिय कीजिए और माइक के आइकन पर क्लिक करके सामान्य वॉइस टाइपिंग आरम्भ कर दीजिए। आब आप अपने फोन पर जो भी बोलेंगे, वो सब आपके कंप्यूटर पर टाइप होता दिखाए देगा।

तो अब अपने कंप्यूटर पर बिना क्रोम ब्राउज़र, बिना जीमेल खाता और बिना इंटरनेट के गूगल वॉइस टाइपिंग का आनंद लीजिए। और हां, यदि आपको हमारा यह तरीका जरा भी पसंद आया हो तो अपने अन्य हिंदी प्रेमी मित्रों को भी बताइए और प्लीज Facebook, Twitter, Google Plus व Email आदि पर शेयर करना मत भूलिएगा।

Monday, October 10, 2016

Google Sheets (Excel) Formula: एक साथ कई भाषाओं में अनुवाद

आइए जानते हैं, गूगल शीट (Excel) में Translation Function के द्वारा एक साथ कई भाषाओं में अनुवाद कैसे करें? मित्रो हम में से अधिकांश लोग एसएस एक्सेल से परिचित है और अपने कार्यालय के काम को तेजी से करने के लिए एक्सेल के कई सारे फंक्शन और फॉर्मूलाओं का प्रयोग करते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि यदि एक्सेल में अनुवाद का भी कोई Function होता, जिसके द्वारा हम एक साथ कई भाषाओं में अनुवाद कर सकते। जी हां, Google Sheets में यह सुविधा उपलब्ध है। गूगल शीट MS excel जैसा ही एक डॉक्यूमेंट होता है जिसमें अनुवाद का इनबिल्ट फ़ॉर्मूला / फंक्शन दिया गया है। इस ट्रांसलेशन फंक्शन के माध्यम से हम दुनिया भर की कई भाषाओं में अनुवाद कर सकते हैं।


आइए जानते हैं इसका प्रयोग कैसे करें:-


STEP-1:

सबसे पहले अपना इंटरनेट ब्राउज़र खोलें और www.docs.google.com यूआरएल टाइप करें। इसके बाद अपने Gmail अकाउंट से लॉगिन करें। अब आपके सामने Google Doc का होम पेज होगा, जिसमें बाईं तरफ ऊपर तीन समांतर लाइन के मीनू (लाल घेरे में) पर क्लिक करें।


STEP-2:

अब कुछ इस प्रकार की स्क्रीन दिखाई देगी, जिसमें आपको Sheets विकल्प पर क्लिक करना होगा। इसके बाद गूगल शीट का होम पेज खुलेगा, जिसमें प्लस (+) के निशान पर क्लिक करके एक नई Google Sheet खोली जा सकती है जो बिलकुल MS Excel जैसी होगी।


STEP-3:

अब इस शीट में हम गूगल के निम्नलिखित अनुवाद फ़ॉर्मूला का प्रयोग करके विभिन्न भाषाओं में एक साथ अनुवाद कर सकते हैं।

Formula Syntax:
=GoogleTranslate("text", "source language", "target language")

STEP-4:

गूगल शीट के किसी भी सेल में उपर्युक्त फ़ॉर्मूला टाइप करके चुटकियों में एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद कर सकते हैं। ऊपर दिए गए चित्र में देखें, स्प्रैडशीट के सेल A3 में अंग्रेजी भाषा में Hello लिखा गया है जिसका अनुवाद हमें सेल D3 में तमिल भाषा में करना है। इसके लिए हमें सेल D3 में Step-3 में बताए Syntax के अनुसार गूगल अनुवाद फॉर्मूला  =GoogleTranslate(A3, “en”, “ta”) टाइप करना होगा।  

Syntax के अनुसार इस फॉर्मूला में -
=====================================
Text = A3
source_language = “en” (English Language का गूगल कोड)
target_language = “ta” (Tamil Language का गूगल कोड)
=====================================

इसी तरह source_language और target_language बदल कर किसी भी भाषा में अनुवाद कर सकते हैं। सभी भाषाओं के कोड जानने के लिए यहां क्लिक करें। 

कुछ उपयोगी टिप्स:
  1. इस फॉर्मूला को Ms Excel के अन्य फॉर्मूलाओं की तरह ही एक Cell से दूसरे Cell में Copy- Paste करके भी प्रयुक्त किया जा सकता है।
  2. Syntax में उल्लिखित “text” के स्थान पर Cell_ID न लिख कर सीधे ही source_language का Text भी लिखा जा सकता है। जैसे, उपर्युक्त उदाहरण में दिए गए फॉर्मूला =GoogleTranslate(A3, “en”, “ta”) में A3 के स्थान पर सीधे ही “Hello” लिख कर =GoogleTranslate(“Hello”, “en”, “ta”) के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
यूट्यूब वीडियो देखें:

यदि आप अब तक Google Sheets की इस सुविधा का उपयोग नहीं कर रहे है, तो अभी आरम्भ कर दीजिए और अपने अनुवाद के भारी-भरकम काम को थोड़ा सा आसान बनाइए।

आपको हमारा यह आर्टिकल कैसा लगा ? इसके बारे में कमेंट बॉक्स के माध्यम से अपने सुझावों और विचारों से ज़रूर अवगत करांए।

Thursday, September 1, 2016

Roman Hindi (English) to Devanagari (हिंदी) Text Converter

रोमन (English) में लिखे हुए टेक्स्ट को देवनागरी हिंदी में कैसे बदलें ? आजकल आपने देखा होगा कि बहुत सारे लोग रोमन (English) लिपि में हिंदी लिखते हैं, जैसे- "अब आपका स्वास्थ्य कैसा है ?" के लिए "ab aapaka svaasthya kaisaa hai ?" लिखा जाता है। इस प्रकार के अंग्रेजी पाठ (Text) को नीचे दिए गए टूल के माध्यम से हिंदी में बदला जा सकता है। कभी - कभी हमें अंग्रेजी की रोमन लिपि में लिखा हुआ बहुत सारा हिंदी टेक्स्ट प्राप्त होता है, जिसे हम देवनागरी में परिवर्तित करना चाहते हैं। इस टूल के माध्यम से बस Copy-Paste करके यह काम बड़ी आसानी और सहजता से कर सकते हैं।


इस टूल से प्राप्त परिणाम अर्थात देवनागरी टेक्स्ट में 100 प्रतिशत शुद्धता नहीं होती। इसका कारण है, रोमन लिपि में हिंदी लिखने की अंग्रेजी की तरह कोइ एक सर्वमान्य पद्धति नहीं है। फिर भी 80 फीसदी तक शुद्ध परिणाम प्राप्त किया जा सकता है। बाकी का काम MS word जैसे किसी Text editor में paste करके मैनुअली किया जा सकता है।

रोमन हिंदी अर्थात अंग्रेजी में लिखे पाठ को देवनागरी हिंदी में बदलें

Paste Your Roman Hindi (English) Text:
देवनागरी लिपि में परिवर्तित पाठ // Devanagari Hindi Text:
Smart Converter

कैसे प्रयोग करें ?

  • दिए गए पहले टेक्स्ट-बॉक्स में रोमन हिंदी अर्थात अंग्रेजी में लिखे गए हिंदी पाठ को पेस्ट करें।
  • जैसे ही आप पहले टेक्स्ट-बॉक्स में लिखना आरम्भ करेंगे या पेस्ट करेंगे, आपको दूसरे टेक्स्ट-बॉक्स में तुरंत ही देवनागरी हिंदी में लिखा हुआ पाठ प्राप्त हो जाएगा।
  • परिवर्तित हिंदी पाठ (Converted Hindi Text) यूनिकोड आधारित होगा, जिसे कॉपी करके कहीं भी पेस्ट किया जा सकता है।

ये भी आजमाए :

Wednesday, August 10, 2016

फ़ॉन्ट पचासा : Top 50 Unicode Based Hindi Fonts

Download Top 50 Unicode Based Hindi Fonts: यूनिकोड एनकोडिंग पर आधारित हिंदी के सुप्रसिद्ध और चुनिंदा 50 फ़ॉन्ट, जिनका डिजिटल हिंदी की दुनियां में व्यापक रूप से प्रयोग किया जा रहा है। अब आपकी लोकप्रिय वेबसाइ्ट www.hindiEtools.com पर मुफ्त में डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध हैं। अकसर लोग इस बात का बहाना बनाकर यूनिकोड में काम करने से बचते रहते हैं कि हिंदी में अच्छे और आकर्षक यूनिकोड आधारित फ़ॉन्ट नहीं है। इसी गलत धारणा को बदलनेऔर यूनिकोड आधारित हिंदी फॉन्टों की अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इस संकलन को तैयार किया गया है।


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Sunday, July 17, 2016

हिंदी भाषा : उत्पत्ति और विकास

हिन्दी भाषा - भूमिका :

  • हिन्दी भारोपीय परिवार की आधुनिक काल की प्रमुख भाषाओं में से एक है। भारतीय आर्य भाषाओं का विकास क्रम इस प्रकार है:- 
    संस्कृत >> पालि >> प्राकृत >> अपभ्रंश >> हिन्दी व अन्य आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ
  • आधुनिक आर्य भाषाएँ उत्तर भारत में बोली जाती हैं। दक्षिण भारत की प्रमुख भाषाएँ तमिल (तमिलनाडु), तेलुगू (आंध्र प्रदेश), कन्नड (कर्नाटक) और मलयालम (केरल) द्रविड़ परिवार की भाषाएँ हैं।
  • भाषा नदी की धारा के समान चंचल होती है। यह रुकना नहीं जानती, यदि कोई भाषा को बलपूर्वक रोकना भी चाहे तो यह उसके बंधन को तोड़ आगे निकाल जाती है। यही भाषा की स्वाभाविक प्रकृति और प्रवृत्ति है।
  • संस्कृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा है जिसे आर्य भाषा या देव भाषा भी कहा जाता है। हिन्दी इसी आर्य भाषा संस्कृत की उत्तराधिकारिणी मानी जाती है
  • हिंदी भाषा के विकास क्रम में भाषा की पूर्वोक्त गत्यात्मकता और समयानुकूल बदलते रहने की स्वाभाविक प्रकृति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
  • हिंदी का जन्म संस्कृत की ही कोख से हुआ है। जिसके साढ़े तीन हजार से अधिक वर्षों के इतिहास को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित करके हिंदी की उत्पत्ति का विकास क्रम निर्धारित किया जा सकता है:- 
    1. प्राचीन भारतीय आर्यभाषा - काल (1500 ई0 पू0 - 500 ई0 पू0)
    2. मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा - काल (500 ई0पू0 - 1000 ई0)
    3. आधुनिक भारतीय आर्यभाषा - काल (1000 ई0 से अब तक)

प्राचीन भारतीय आर्यभाषा - काल : 1500 - 500 ई0 पू0 : वैदिक एवं लौकिक संस्कृत

  • इस काल में वेदों, ब्राह्मणग्रंथों, उपनिषदों के अलावा वाल्मीकि, व्यास, अश्वघोष, भाष, कालिदास तथा माघ आदि की संस्कृत रचनओं का सृजन हुआ।
  • पाणिनी के व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी में 'वैदिक' और 'लौकिक' नामों से दो प्रकार की संस्कृत भाषा का उल्लेख पाया जाता है।
  • एक हजार वर्षों के इस कालखण्ड को संस्कृत भाषा के स्वरूप व्याकरणिक नियमों में अंतर के आधार पर निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जाता है -
    1. वैदिक संस्कृत : (1500 ई0 पू0 – 1000 ई0 पू0)
      • मूल रूप से वेदों की रचना जिस भाषा में हुई उसे वैदिक संस्कृत कहा जाता है।
      • संस्कृत का प्राचीनतम रूप संसार की (अब तक ज्ञात) प्रथम कृति ऋग्वेद में प्राप्त होता है। 
      • ब्राह्मण ग्रंथों और उपनिषदों की रचना भी वैदिक संस्कृत में हुई, हालांकि इनकी भाषा में पर्याप्त अंतर पाया जाता है।
    2. लौकिक संस्कृत : (1000 ई0 पू0 – 500 ई0 पू0)
      • दर्शन ग्रंथों के अतिरिक्त संस्कृत का उपयोग साहित्य में भी हुआ। इसे लौकिक संस्कृत कहते हैं। वाल्मीकि, व्यास, अशवघोष, भाष, कालिदास, माघ आदि की रचनाएं इसी में है।
      • वेदों के अध्ययन से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि कालान्तर में वैदिक संस्कृत के स्वरूप में भी बदलाव आता चला गया। 
      • पाणिनी और कात्यायन ने संस्कृत भाषा के बिगड़ते स्वरूप का संस्कार किया और इसे व्याकरणबद्ध किया। पाणिनि के नियमीकरण के बाद की संस्कृत, वैदिक संस्कृत से काफ़ी भिन्न है जिसे लौकिक या क्लासिकल संस्कृत कहा गया।
      • रामायण, महाभारत, नाटक, व्याकरण आदि ग्रंथ लौकिक संस्कृत में ही लिखे गए हैं।
  • हिन्दी का प्राचीनतम रूप संस्कृत ही है।
  • संस्कृत काल के अंतिम पड़ाव तक आते- आते मानक अथवा परिनिष्ठित भाषा तो एक ही रही, किन्तु क्षेत्रीय स्तर पर तीन क्षेत्रीय बोलियाँ यथा– (i)पश्चिमोत्तरीय (ii)मध्यदेशीय और (iii)पूर्वी विकसित हो गईं।

मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा - काल : 500 ई0पू0 - 1000 ई0 : पालि, प्राकृत एवं अपभ्रंश

  • मूलतः इस काल में लोक भाषा का विकास हुआ। इस समय भाषा का जो रूप सामने आया उसे ‘प्राकृत’ कहा गया।
  • वैदिक और लौकिक संस्कृत के काल में बोलचाल की जो भाषा दबी पड़ी हुई थी, उसने अनुकूल समय पाकर सिर उठाया और जिसका प्राकृतिक विकास ‘प्राकृत’ के रूप में हुआ।
  • प्राकृत के वररुचि आदि वैयाकरणों ने प्राकृत भाषाओं की प्रकृति संस्कृत को मानकर उससे प्राकृत शब्द की व्युत्पत्ति की है। "प्रकृति: संस्कृतं, तत्रभवं तत आगतं वा प्राकृतम्"।
  • मध्यकाल में यही प्राकृत निम्नलिखित तीन अवस्थाओं में विकसित हुईः-
    1. पालि : (500 ई0 पू0 - 1 ईसवी)
      • संस्कृत कालीन बोलचाल की भाषा विकसित होते- होते या कहें कि सरल होते- होते 500 ई0 पू0 के बाद काफी बदल गई, जिसे पालि नाम दिया गया।
      • इसे सबसे पुरानी प्राकृत और भारत की प्रथम देश भाषा कहा जाता है। ‘मगध’ प्रांत में उत्पन्न होने के कारण श्रीलंका के लोग इसे ‘मागधी’ भी कहते हैं।
      • बौद्ध ग्रन्थों की ‘पालि भाषा’ में बोलचाल की भाषा का शिष्ट और मानक रूप प्राप्त होता है।
      • इस काल में आते-आते क्षेत्रीय बोलियों की संख्या तीन से बढ़कर चार हो गई। (i) पश्चिमोत्तरीय (ii) मध्यदेशीय (iii) पूर्वी और (iv) दक्षिणी
    2. प्राकृत : (1 ई0 - 500 ई0 )
      • पहली ईसवी तक आते-आते यह बोलचाल की भाषा और परिवर्तित हुई तथा इसको प्राकृत की संज्ञा दी गई।
      • सामान्य मतानुसार जो भाषा असंस्कृत थी और बोलचाल की आम भाषा थी तथा सहज ही बोली समझी जाती थी, स्वभावतः प्राकृत कहलायी।
      • इस काल में क्षेत्रीय बोलियों की संख्या कई थी, जिनमें शौरसेनी, पैशाची, ब्राचड़, महाराष्ट्री, मागधी और अर्धमागधी आदि प्रमुख हैं।
      • भाषा विज्ञानियों ने प्राकृतों के पाँच प्रमुख भेद स्वीकार किए हैं -
        1. शौरसेनी (सूरसेन- मथुरा के आस-पास मध्य देश की भाषा जिस पर संस्कृत का प्रभाव)
        2. पैशाची (सिन्ध)
        3. महाराष्ट्री (विदर्भ महाराष्ट्र)
        4. मागधी (मगध)
        5. अर्द्धमागधी (कोशल प्रदेश की भाषा, जैन साहित्य में प्रयुक्त)
    3. अपभ्रंश : (500 ई0 से 1000 ई0 )
      • भाषावैज्ञानिक दृष्टि से अपभ्रंश भारतीय आर्यभाषा के मध्यकाल की अंतिम अवस्था है जो प्राकृत और आधुनिक भाषाओं के बीच की स्थिति है।
      • कुछ दिनों बाद प्राकृत में भी परिवर्तन हो गया और लिखित प्राकृत का विकास रुक गया, परंतु कथित प्राकृत विकसित अर्थात परिवर्तित होती गई। लिखित प्राकृत के आचार्यों ने इसी विकासपूर्ण भाषा का उल्लेख अपभ्रंश नाम से किया है। इन आचार्यों के अनुसार 'अपभ्रंश' शब्द का अर्थ बिगड़ी हुई भाषा था।
      • प्राकृत भाषाओं की तरह अपभ्रंश के परिनिष्ठित रूप का विकास भी ‘मध्यदेश’ में ही हुआ था। विभिन्न प्रकृतों सी ही इन क्षेत्रीय अपभ्रंशों का विकास हुआ।
      • प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी ‘डॉ. भोलानाथ तिवारी’ ने विभिन्न प्राकृतों से विकसित अपभ्रंश के निम्नलिखित सात भेद स्वीकार किए हैं, जिनसे आधुनिक भारतीय भाषाओं/उप भाषाओं का जन्म हुआ -
        1. शौरसेनी : पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी और गुजराती
        2. पैशाची : लंहदा , पंजाबी
        3. ब्राचड़ : सिन्धी
        4. खस : पहाड़ी
        5. महाराष्ट्री : मराठी
        6. मागधी : बिहारी, बांग्ला, उड़िया व असमिया
        7. अर्ध मागधी : पूर्वी हिन्दी
      • अतः कहा जा सकता है कि हिन्दी भाषा का विकास अपभ्रंश के शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी रूपों से हुआ है।

आधुनिक भारतीय आर्यभाषा - काल : 1000 ई0 से अब तक : हिंदी एवं अन्य आधुनिक आर्यभाषाएँ

  • 1100 ई0 तक आते-आते अपभ्रंश का काल समाप्त हो गया और आधुनिक भारतीय भाषाओं का युग आरम्भ हुआ।
  • जैसा कि पहले ही बताया गया है कि अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय स्वरूपों से आधुनिक भारतीय भाषाओं/ उप-भाषाओं यथा पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती, लंहदा, पंजाबी, सिन्धी, पहाड़ी, मराठी बिहारी, बांग्ला, उड़िया, असमिया और पूर्वी हिन्दी आदि का जन्म हुआ है। आगे चलकर पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, बिहारी, पूर्वी हिन्दी और पहाड़ी पाँच उप-भाषाओं तथा इनसे विकसित कई क्षेत्रिय बोलियों जैसे ब्रजभाषा, खड़ी बोली, जयपुरी, भोजपुरी, अवधी व गढ़वाली आदि को समग्र रूप से हिंदी कहा जाता है।
  • कालांतर में खड़ी बोली ही अधिक विकसित होकर अपने मानक और परिनिष्ठित रूप में वर्तमान और बहुप्रचलित मानक हिंदी भाषा के रूप में सामने आई

नोट :

  • अपभ्रंश और आधुनिक हिन्दी के बीच की कड़ी के रूप में भाषा का एक और रूप प्राप्त होता है। जिसे विद्वानो का एक वर्ग अवहट्ट कहता है। वहीं अधिकांश विद्वान इसे अपभ्रंश ही मानते हैं।
  • अवहट्ट नाम स्पष्ट रूप से विद्यापति की ‘कीर्तिलता’ में आता है-
    “देसिल बयना सब जन मिट्ठा । तें तइसन जम्पओ अवहट्ठा॥”
  • उन्होने इन पंक्तियों में देसिल बयान (देशी कथन) और अवहट्ट को एक ही माना है।
  • अवहट्ट को अपभ्रंश से भिन्न मानने वाले विद्वान इसे हिन्दी का ही पूर्व रूप मानते हैं। स्पष्टतः अवहट्ट को हिन्दी और अपभ्रंश को जोड़ने वाली कड़ी के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

Tuesday, July 5, 2016

हिन्दी साहित्य का इतिहास : काल विभाजन एवं नामकरण

इतिहास के काल विभाजन का आधार एवं उद्देश्य :

  • विभिन्न प्रकाशित, अप्रकाशित रचनाओं के साथ ही साथ विद्वानों द्वारा तमाम आलोचनात्माक व शोधपरक ग्रंथों और रचनाओं व रचनाकारों का परिचय देने वाली अनेक कृतियों को भी कालविभाजन और नामकरण की आधार सामग्री के रूप में लिया गया।
  • समग्र साहित्य को खंडों, तत्वों, वर्गों आदि में विभाजित कर अध्ययन को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने में काल विभाजन सहायक।
  • अंग, उपांग तथा प्रवृत्तियों को समझने एवं स्पष्टता लाने के लिए आवश्यक।

काल विभाजन के आरंभिक प्रयास :

  • 19वीं सदी से पूर्व विभिन्न कवियों और लेखकों द्वारा चौरासी वैष्णवन की वार्ता, दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, भक्तमाल, कविमाला आदि जैसे कई ग्रंथों में हिन्दी कवियों के जीवनवृत्त और रचना कर्म का परिचय देकर हिन्दी साहित्य के इतिहास और कालक्रम को आधार देने के प्रयास किए जाते रहे हैं. 
  • किंतु हिंदी साहित्य इतिहास के काल विभाजन के आरंभिक प्रयासों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रयास गार्सा द तांसी के ‘इस्तवार द लितुरेत्यूर ऐन्दुई ऐ ऐन्दुस्तानी’, जॉर्ज ग्रियर्सन के ‘द मॉर्डन वर्नाक्यूलर ऑफ हिन्दुस्तान’ मौलवी करीमुद्दीन के तजकिरा-ई-शुअरा-ई-हिंदी (तबकातु शुआस) तथा शिवसिंग सेंगर द्वारा लिखित इतिहास ग्रंथ ‘शिवसिंग सरोज’ में किए गए।
  • गार्सा द तांसी के ग्रंथ ‘इस्तवार द लितुरेत्यूर ऐन्दुई ऐ ऐन्दुस्तानी’ को अधिकांश विद्वान हिंदी का प्रथम इतिहास मानते हैं।
  • प्रथम तर्क संगत प्रयास सन 1934 ई. में मिश्र बंधुओं (पं. गणेश बिहारी मिश्र, डॉ. श्याम बिहारी मिश्र एवं डॉ. शुकदेव बिहारी मिश्र ) द्वारा किया गया ।

मिश्रबंधुओं का काल विभाजन :

मिश्रबंधुओं द्वारा अपनी रचना 'मिश्रबंधु-विनोद' (1913 में तीन भाग तथा 1929 में चौथा भाग) में हिंदी साहित्य के इतिहास को निम्नलिखित 5 भागों और उप-भागों में बांटा गया है: -
  1. आरंभिक काल :
      • पूर्वारंभिक काल :  (700 - 1343 वि.)
      • उत्तरारंभिक काल : (1344 - 1444 वि.)
  2. माध्यमिक काल :
      • पूर्वमाध्यमिक काल : (1445 - 1560 वि.)
      • प्रौढ़ माध्य काल : (1561 - 1680 वि.)
  3. अलंकृत काल :
      • पूर्वालंकृत काल : (1681 - 1790 वि.)
      • उत्तरालंकृत काल : (1791 - 1889 वि.)
  4. परिवर्तन काल : (1890 - 1925 वि.)

  5. वर्तमान काल : (1925 वि. से अब तक )

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काल विभाजन:

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्बारा 1929 में 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' नामक ग्रंथ में किए गए काल विभाजन को ही अब तक सर्वाधिक प्रमाणिक और तार्किक माना जाता रहा है। यह इतिहाल ग्रंथ मूलत: नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित 'हिन्दी शब्द सागर' की भूमिका के रूप में लिखा गया था। उन्होने सम्पूर्ण हिंदी साहित्य को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया है: -
  1. वीरगाथा काल : (1050 - 1375 वि.)
  2. भक्ति काल : (1375 - 1700 वि.)
  3. रीति काल : (1700 - 1900 वि.)
  4. गद्य काल : (1900 वि. से आगे...)
  • काल विभाजन को सर्वथा नवीन रूप तथा कालों की संख्या सीमित ।
  • अधिकांश विद्वानों द्वारा स्वीकृत, स्पष्ट तथा तर्कसंगत काल विभाजन ।

डॉ. राम कुमार वर्मा का काल विभाजन :

सन् 1938 में प्रकाशित 'हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' में डॉ. राम कुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य के इतिहास का काल विभाजन निम्नानुसार किया है: -
  1. संधि काल : (750 - 1000 वि.)
  2. चारण काल : (1000 - 1375 वि.)
  3. भक्ति काल : (1375 - 1700 वि.)
  4. रीति काल : (1700 - 1900 वि.)
  5. आधुनिक काल : (1900 वि. से आगे...)
  • केवल वीरगाथा काल को चारण काल कहा, शेष आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा किए गए विभाजन के ही अनुरूप।
  • वस्तुत: देखा जाए तो वीरगाथाएँ चारणों द्वारा ही गाईं जातीं थीं।
  • संधि काल में स्पष्टता का अभाव ।

डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त का काल विभाजन:

सन् 1938 में प्रकाशित 'हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास' (दो भाग) में डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त ने शुक्ल जी की मान्यताओं का सतर्क खंडन करते हुए हिंदी साहित्य के इतिहास को प्रमुख रूप से निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है :-
  1. प्रारम्भिक काल : (1189 - 1350 ई.)
  2. मध्य काल :
    • पूर्व मध्य काल : (1350 - 1600 वि.)
    • उत्तर मध्य काल : (1600 - 1857 वि.)
  3. आधुनिक काल : (1857 वि. से आगे...)

'एफ. ई . के' द्वारा किया गया काल विभाजन :

वृत्त संग्रहों को आधार मानकर कई अन्य विद्वानों ने भी काल विभाजन का प्रयास किया है। यहां 'एफ. ई . के' द्वारा किया गया काल विभाजन उल्लेखनीय है।
  1. प्राचीन चारण काव्य : ( 1150 - 1400 वि. )
  2. प्राचीन भक्त काव्य : ( 1400 - 1550 वि. )
  3. कबीर के उत्तराधिकारी : ( 1550 - 1750 वि. )
  4. आधुनिक काल : ( 1800 वि. से आगे...)

विभिन्न विद्वानों के विविध मत :

भक्तिकाल और आधुनिक काल के संबंध में विद्बानों में अधिक मतभेद नहीं हैं। केवल वीरगाथा काल और रीतिकाल के नामकरण को लेकर ही कुछ आलोचकों को आपत्ति है। इन कालों के नामकरण के संबंध में कुछ प्रमुख विद्वानों के मत निम्नलिखित हैं।
  • वीरगाथा काल: सिद्ध सामंत युग (राहुल सांकृत्यायन), आदिकाल (डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी), अपभ्रंशकाल (चंद्रधर शर्मा गुलेरी), बीजवपनकाल (महावीर प्रसाद द्विवेदी) आदि।
  • रीतिकाल: कला काल (रमाशंकर शुक्लं ‘रसाल’), शृंगार काल (आचार्य विश्वदनाथ प्रसाद मिश्र), अलंकृत काल (मिश्रबंधु) आदि।

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Saturday, July 2, 2016

हिन्दी कम्प्यूटिंग : कुछ बाधाएं और कुछ उपाय

हिंदी कम्प्यूटिंग से संबन्धित लेखों की शृंखला (Series) का तीसरा लेख

कुछ बाधाएं :

अभी भी हिंदी कम्प्यूटिंग की राह में अनेक अवरोध हैं जिन्हें दूर करके ही डिजिटल हिंदी की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित समस्याएं आज भी राह का रोड़ा बनी हुई हैं:-

  • कम्प्यूटर में हिंदी समर्थन को सक्रिय करने की समस्या:- कम्प्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम में हिंदी समर्थन पहले से ही सक्रिय नहीं रहता है. इसे बाद में सक्रिय करना पड़ता हैं। उल्लेखनीय है की भारत में अभी भी windows Xp पर आधारित कंप्यूटर काफी संख्या में है, जिनमें हिंदी अथवा यूनिकोड सक्रिय करते समय ऑपरेटिंग सिस्टम की सी. डी या किसी विशेष डाटा फाइल की आवश्यकता होती है। इससे यूजर के अंदर मनोवैज्ञानिक रूप से झुंझलाहट की स्थिति बन जाती है और कभी- कभी वह सोचता है कि हिंदी आदि भारतीय भाषाएं सामान्य रूपे से कम्प्यूटर के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
  • हिन्दी की बोर्ड की समस्या:- ऑपरेटिंग सिस्टम में हिंदी सक्रिय होने के बाद भी अगली समस्या आती है की बोर्ड ले-आउट की, क्योंकि कम्प्यूटर का कीबोर्ड बाइडिफॉल्ट अंग्रेजी में ही होता है। कम्प्यूटर में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भारत सरकार द्वारा मानक INSCRIPT Keyboard इनबिल्ट होता है, जो अभी भी अधिक प्रचलित नहीं है। अत: आसानी से काम करने के लिए अलग से की-बोर्ड सॉफ्टवेयर इंस्टाल करने की आवश्यकता होती है। जबकि अंग्रेजी के साथ ऐसी समस्या नहीं है।
  • हिंदी टाइपिंग की विभिन्न पद्धतियां:- अंग्रेजी टाइपिंग की तरह हिंदी टाइपिंग के लिए आज तक किसी प्रभावी और मानक टाइपिंग विधि का निर्माण नहीं किया जा सका है। हालांकि भारात सरकार ने काफी पहले ही INSCRIPT की बोर्ड को मानक घोषित कर दिया है, किन्तु यह लोकप्रिय नहीं हो सका। हिंदी टाइपिंग के लिई समानान्तर रूप से अनेक विधियां प्रचलित हैं जैसे- फोनेटिक, इनस्क्रिप्ट एवं रेमिंगटन आदि। किसी भी नए प्रयोक्ता के लिए यह भी एक जटिल समस्या हो सकती है कि वह किस पद्धति के साथ आरम्भ करे।
  • पुराने ऑपरेटिंग सिस्टमों में हिंदी सक्रिय करने में समस्या:- हमारे यहां आज भी पुराने ऑपरेटिंग सिस्टम वाले कम्प्यूटर बहुतायत में पाए जाते हैं या कहैं कि भारतीय माध्यम वर्ग के पास अभी में भी विण्डोज एक्सपी या उससे भी पुराने ऑपरेटिंग सिस्टम वाले कम्प्यूटर हैं। इन ऑपरेटिंग सिस्टमों पर हिंदी सक्रिय करना एक जटिल समस्या है।
  • गैर-यूनिकोड प्रोग्रामों में हिंदी टाइपिंग की समस्या:- युनिकोड के आ जाने के बाद भी अभी बहुत सारे प्रोग्रामों खासकर ग्राफिक्स और डीटीपी आदि में केवल 8 बिट ट्रू टाइप फॉन्टों जैसे कृतिदेव आदि के द्वारा और केवल रेमिंगटन टाइपिंग से ही सही हिंदी टाइप सम्भव है। हिंदी के व्यापक प्रयोग में यह एक बड़ी रुकावट है।
  • हिंदी कम्प्यूटिंग के क्षेत्र में जागरुकता का अभाव:- सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में भी कम्प्यूटर में हिंदी प्रयोग के क्षेत्र में जागरुकता का अभाव है। यदि लोग जागरुक हो जाएं और शिक्षा-पाठ्यक्रम में सुधार के साथ छात्रों को उचित समय पर यूनिकोड एवं हिंदी कम्प्यूटिंग की जानकारी से दी जाए तो आधी से अधिक समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी।

कुछ उपाय:

समस्याओं के साथ ही साथ समाधान खोजने के प्रयास भी होते रहते हैं। विभिन्न तकनीकीविदों ने उक्त समस्याओं के अनेक समाधान भी प्रस्तुत किए हैं। इनमें से ‘ई-पण्डिट’ ब्लॉग पर श्री श्रीस जी द्वारा दिए गए कुछ सुझावों का मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा -
  • ऑपरेटिंग सिस्टमों में हिन्दी-इण्डिक सपोर्ट:- ऑपरेटिंग सिस्टमों में हिंदी – इण्डिक सपोर्ट पहले से ही मौजूद होना चाहिए, जिससे इसे सक्रिय करने का झंझट समाप्त हो जाए। माइक्रोसॉफ्ट के विण्डोज विस्टा और इसके बाद वाले नए ऑपरेटिंग सिस्टम में यह इनबिल्ट हो चुका है। अतः इस बारे में निश्चिंत रह सकते हैं कि आने वाले समय में नए ऑपरेटिंग सिस्टमों इण्डिक सपोर्ट पहले से ही मौजूद होगा इस तरह इस समस्या का समाधान कुछ समय बाद स्वत: ही हो जाएगा।
  • विण्डोज में हिन्दी के वैकल्पिक कीबोर्ड इनबिल्ट हों:- हिन्दी की बोर्ड को अलग से इंस्टाल करने की समस्या से छुटकारा पाने के लिए विण्डोज इंस्टाल करने पर हिन्दी लिखने के लिए हिंदी आईएमई या अन्य कीबोर्ड पहले से ही उपल्ब्ध होने चाहिए। अभी विण्डोज में सिर्फ इनस्क्रिप्ट आईएमई ही इनबिल्ट होता है, फोनेटिक तथा रेमिंगटन नहीं है। अगर ऑपरेटिंग सिस्टम में ये टाइपिंग टूल पहले से ही मौजूद होंगे तो अन्य स्रोतों से डाउनलोड कर इंस्टाल करने से मुक्ति तो मिलेगी ही, हिंदी कम्प्यूटिंग में क्रांतिकारी बदलाव आ जाएगा।
  • पुराने ऑपरेटिंग सिस्टमों में यूनिकोड समर्थन:- विण्डोज 98 से पहले के ऑपरेटिंग सिस्टमों में यूनिकोड का सीमित समर्थन ही है। क्योंकि इनके लिए प्रचलित आईएमई जैसे बाराह, इंडिक आईएमई आदि जैसे कीबोर्ड ड्राइवर न तो अब उपल्ब्ध हैं और नहीं बनाए जा सकते हैं। अभी इसका उपाय ब्राउजरों के लिए IME प्लगइन से ही किया जा सकता है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त कुछ अन्य सुझाव भी ध्यान देने योग्य हैं जैसे – गैर यूनिकोडित प्रोग्रामों के लिए एक नॉन-यूनिकोड आईएमई/कीबोर्ड ड्राइवर बनाया जाय। हिंदी टंकण के लिए अंग्रेजी की तरह किसी एक उपयुक्त एवं मानक पद्धति को अनिवार्य कर सरकार द्वारा अभियान चलाकर उसे लोकप्रिय किया जाना चाहिए। कम्प्यूटर में हिन्दी के व्यापक प्रयोग को दृष्तिगत रखते हुए तथा शत-प्रतिशत हिंदी कम्प्यूटिंग का सपना देखने से पहले हमारे लिए विभिन्न सॉफ्टवेयरों का मानक हिंदी में अनुवाद करना अनिवार्य होगा। इन सबके अतिरिक्त आज के समय में कम्प्यूटर पाठ्यक्रमों में हिन्दी/इण्डिक कम्प्यूटिंग को स्थान देना सबसे बड़ी आवश्यकता है। सूचना प्रद्यौगिकी में अग्रणी भारत देश में किसी भी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम में इण्डिक कम्प्यूटिंग विषय शामिल नहीं है। अच्छे-अच्छे आईटी प्रोफैशनलों को भी यूनिकोड के बारे पता नहीं हैं। यूनिकोड का नाम सुनते ही वो बगलें झांकने लगते हैं। ऐसे लोग हिंदी कम्प्यूटिंग में क्या योगदान दे पाएंगे। अत: हर विश्वविद्यालयी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम में इण्डिक कम्प्यूटिंग विषय शामिल होना चाहिए जिसमें यूनिकोड, इनस्क्रिप्ट तथा अन्य टाइपिंग प्रणालियाँ, देवनागरी लिपि का परिचय, हिन्दी कम्प्यूटिंग के मौजूदा साधन तथा बहुभाषी सॉफ्टवेयरों (Multilingual Softwares) का विकास, प्राकृतिक भाषा संसाधन (Natural Language Processing) आदि की जानकारी शामिल हो।

और आखिर में कुछ अपनी बात:

इंटरनेट पर ब्लॉग, वेबसाइट आदि पर कोई पाठक अथवा जिज्ञासु गूगल जैसे सर्च इंजनों के माध्यम से ही पहुंचता है। यदि गूगल अपना इण्डिक ट्रांसलिट्रेशन टूल ‘Google India’ पेज तथा जीमेल पर लगा दे तो हिन्दी टाइपिंग और ब्लॉगिंग से अनभिज्ञ लोग भी इससे परिचित होंगे और हिंदी कम्प्यूटिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। सबसे महत्वपूर्ण होगा यूनिकोड के बारे में अधिक से अधिक जागरुकता फैलाना। परिस्थितियों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि आज के समय में उन्हीं भाषाओं का अस्तित्व बच पाएगा जो इंटरनेट और कम्प्यूटिंग से जुड़ी होंगी। इस कसौटी पर हिंदी को खरा उतरने के लिए हिंदी में लिखने, खोजने, संदेश भेजने, सहेजने, फॉण्ट परिवर्तन करने संबंधी आदि विभिन्न सॉफ्टवेयरों की आवश्यकता होगी। अत: वर्तमान परिदृश्य में हिंदी कम्प्यूटिंग का महत्व और बढ़ जाता है। कम्प्यूटर के जरिए ही हिंदी एक वैश्विक भाषा का रूप ले सकेगी और विश्व की महत्वपूर्ण भाषाओं के बीच एक सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकेगी। हिंदी के नाम पर प्रतियोगिताओं, बैठकों, पुरस्कार योजनाओं आदि के साथ ही हिंदी कम्प्यूटिंग की ओर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। हिंदी को कम्प्यूटर पर उसका उचित स्थान दिलाकर ही सच्चे अर्थों में हिंदी को एक सशक्त भाषा बनाया जा सकता है।

नोट: हिंदी कम्प्यूटिंग से संबन्धित तीन लेखों की शृंखला (Series) में का तीसरा और अंतिम लेख है, इस कड़ी के अन्य लेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें और कमेन्ट बॉक्स के माध्यम से अपने विचार और प्रतिक्रियाओं से अवगत कराएं।

पहला लेख "हिन्दी कम्प्यूटिंग : एक परिचय" यहाँ से पढ़ें।
दूसरा लेख "हिन्दी कम्प्यूटिंग : आधारभूत तत्व एवं वर्तमान स्वरूप" यहाँ से पढ़ें।
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Thursday, May 19, 2016

संख्या से शब्दों में परिवर्तक || Number to Text Converter

इस Tool के द्वारा आप भारतीय संख्या पद्धति (Indian Number System) के आधार पर बड़ी से बड़ी संख्या को आसानी से शब्दों में बदल सकते है। भारतीय पद्धति के आधार पर संख्याओं को शब्दों में व्यक्त करना, पाश्चात्य पद्धति से अधिक उपयुक्त और तर्कसंगत है।


नीचे दिए गए बॉक्स में कोई संख्या लिखिए:
(21 अंको से कम; एक बार में केवल एक ही संख्या; कॉमा के साथ अथवा बिना कॉमा के)
उपर के बॉक्स में दी गयी संख्या शब्दों में निम्नलिखित होगी:

Tuesday, May 17, 2016

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