Sunday, July 17, 2016

हिंदी भाषा : उत्पत्ति और विकास

हिन्दी भाषा - भूमिका :

  • हिन्दी भारोपीय परिवार की आधुनिक काल की प्रमुख भाषाओं में से एक है। भारतीय आर्य भाषाओं का विकास क्रम इस प्रकार है:- 
    संस्कृत >> पालि >> प्राकृत >> अपभ्रंश >> हिन्दी व अन्य आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ
  • आधुनिक आर्य भाषाएँ उत्तर भारत में बोली जाती हैं। दक्षिण भारत की प्रमुख भाषाएँ तमिल (तमिलनाडु), तेलुगू (आंध्र प्रदेश), कन्नड (कर्नाटक) और मलयालम (केरल) द्रविड़ परिवार की भाषाएँ हैं।
  • भाषा नदी की धारा के समान चंचल होती है। यह रुकना नहीं जानती, यदि कोई भाषा को बलपूर्वक रोकना भी चाहे तो यह उसके बंधन को तोड़ आगे निकाल जाती है। यही भाषा की स्वाभाविक प्रकृति और प्रवृत्ति है।
  • संस्कृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा है जिसे आर्य भाषा या देव भाषा भी कहा जाता है। हिन्दी इसी आर्य भाषा संस्कृत की उत्तराधिकारिणी मानी जाती है
  • हिंदी भाषा के विकास क्रम में भाषा की पूर्वोक्त गत्यात्मकता और समयानुकूल बदलते रहने की स्वाभाविक प्रकृति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
  • हिंदी का जन्म संस्कृत की ही कोख से हुआ है। जिसके साढ़े तीन हजार से अधिक वर्षों के इतिहास को निम्नलिखित तीन भागों में विभाजित करके हिंदी की उत्पत्ति का विकास क्रम निर्धारित किया जा सकता है:- 
    1. प्राचीन भारतीय आर्यभाषा - काल (1500 ई0 पू0 - 500 ई0 पू0)
    2. मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा - काल (500 ई0पू0 - 1000 ई0)
    3. आधुनिक भारतीय आर्यभाषा - काल (1000 ई0 से अब तक)

प्राचीन भारतीय आर्यभाषा - काल : 1500 - 500 ई0 पू0 : वैदिक एवं लौकिक संस्कृत

  • इस काल में वेदों, ब्राह्मणग्रंथों, उपनिषदों के अलावा वाल्मीकि, व्यास, अश्वघोष, भाष, कालिदास तथा माघ आदि की संस्कृत रचनओं का सृजन हुआ।
  • पाणिनी के व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी में 'वैदिक' और 'लौकिक' नामों से दो प्रकार की संस्कृत भाषा का उल्लेख पाया जाता है।
  • एक हजार वर्षों के इस कालखण्ड को संस्कृत भाषा के स्वरूप व्याकरणिक नियमों में अंतर के आधार पर निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया जाता है -
    1. वैदिक संस्कृत : (1500 ई0 पू0 – 1000 ई0 पू0)
      • मूल रूप से वेदों की रचना जिस भाषा में हुई उसे वैदिक संस्कृत कहा जाता है।
      • संस्कृत का प्राचीनतम रूप संसार की (अब तक ज्ञात) प्रथम कृति ऋग्वेद में प्राप्त होता है। 
      • ब्राह्मण ग्रंथों और उपनिषदों की रचना भी वैदिक संस्कृत में हुई, हालांकि इनकी भाषा में पर्याप्त अंतर पाया जाता है।
    2. लौकिक संस्कृत : (1000 ई0 पू0 – 500 ई0 पू0)
      • दर्शन ग्रंथों के अतिरिक्त संस्कृत का उपयोग साहित्य में भी हुआ। इसे लौकिक संस्कृत कहते हैं। वाल्मीकि, व्यास, अशवघोष, भाष, कालिदास, माघ आदि की रचनाएं इसी में है।
      • वेदों के अध्ययन से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि कालान्तर में वैदिक संस्कृत के स्वरूप में भी बदलाव आता चला गया। 
      • पाणिनी और कात्यायन ने संस्कृत भाषा के बिगड़ते स्वरूप का संस्कार किया और इसे व्याकरणबद्ध किया। पाणिनि के नियमीकरण के बाद की संस्कृत, वैदिक संस्कृत से काफ़ी भिन्न है जिसे लौकिक या क्लासिकल संस्कृत कहा गया।
      • रामायण, महाभारत, नाटक, व्याकरण आदि ग्रंथ लौकिक संस्कृत में ही लिखे गए हैं।
  • हिन्दी का प्राचीनतम रूप संस्कृत ही है।
  • संस्कृत काल के अंतिम पड़ाव तक आते- आते मानक अथवा परिनिष्ठित भाषा तो एक ही रही, किन्तु क्षेत्रीय स्तर पर तीन क्षेत्रीय बोलियाँ यथा– (i)पश्चिमोत्तरीय (ii)मध्यदेशीय और (iii)पूर्वी विकसित हो गईं।

मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा - काल : 500 ई0पू0 - 1000 ई0 : पालि, प्राकृत एवं अपभ्रंश

  • मूलतः इस काल में लोक भाषा का विकास हुआ। इस समय भाषा का जो रूप सामने आया उसे ‘प्राकृत’ कहा गया।
  • वैदिक और लौकिक संस्कृत के काल में बोलचाल की जो भाषा दबी पड़ी हुई थी, उसने अनुकूल समय पाकर सिर उठाया और जिसका प्राकृतिक विकास ‘प्राकृत’ के रूप में हुआ।
  • प्राकृत के वररुचि आदि वैयाकरणों ने प्राकृत भाषाओं की प्रकृति संस्कृत को मानकर उससे प्राकृत शब्द की व्युत्पत्ति की है। "प्रकृति: संस्कृतं, तत्रभवं तत आगतं वा प्राकृतम्"।
  • मध्यकाल में यही प्राकृत निम्नलिखित तीन अवस्थाओं में विकसित हुईः-
    1. पालि : (500 ई0 पू0 - 1 ईसवी)
      • संस्कृत कालीन बोलचाल की भाषा विकसित होते- होते या कहें कि सरल होते- होते 500 ई0 पू0 के बाद काफी बदल गई, जिसे पालि नाम दिया गया।
      • इसे सबसे पुरानी प्राकृत और भारत की प्रथम देश भाषा कहा जाता है। ‘मगध’ प्रांत में उत्पन्न होने के कारण श्रीलंका के लोग इसे ‘मागधी’ भी कहते हैं।
      • बौद्ध ग्रन्थों की ‘पालि भाषा’ में बोलचाल की भाषा का शिष्ट और मानक रूप प्राप्त होता है।
      • इस काल में आते-आते क्षेत्रीय बोलियों की संख्या तीन से बढ़कर चार हो गई। (i) पश्चिमोत्तरीय (ii) मध्यदेशीय (iii) पूर्वी और (iv) दक्षिणी

    2. प्राकृत : (1 ई0 - 500 ई0 )
      • पहली ईसवी तक आते-आते यह बोलचाल की भाषा और परिवर्तित हुई तथा इसको प्राकृत की संज्ञा दी गई।
      • सामान्य मतानुसार जो भाषा असंस्कृत थी और बोलचाल की आम भाषा थी तथा सहज ही बोली समझी जाती थी, स्वभावतः प्राकृत कहलायी।
      • इस काल में क्षेत्रीय बोलियों की संख्या कई थी, जिनमें शौरसेनी, पैशाची, ब्राचड़, महाराष्ट्री, मागधी और अर्धमागधी आदि प्रमुख हैं।
      • भाषा विज्ञानियों ने प्राकृतों के पाँच प्रमुख भेद स्वीकार किए हैं -
        1. शौरसेनी (सूरसेन- मथुरा के आस-पास मध्य देश की भाषा जिस पर संस्कृत का प्रभाव)
        2. पैशाची (सिन्ध)
        3. महाराष्ट्री (विदर्भ महाराष्ट्र)
        4. मागधी (मगध)
        5. अर्द्धमागधी (कोशल प्रदेश की भाषा, जैन साहित्य में प्रयुक्त)
    3. अपभ्रंश : (500 ई0 से 1000 ई0 )
      • भाषावैज्ञानिक दृष्टि से अपभ्रंश भारतीय आर्यभाषा के मध्यकाल की अंतिम अवस्था है जो प्राकृत और आधुनिक भाषाओं के बीच की स्थिति है।
      • कुछ दिनों बाद प्राकृत में भी परिवर्तन हो गया और लिखित प्राकृत का विकास रुक गया, परंतु कथित प्राकृत विकसित अर्थात परिवर्तित होती गई। लिखित प्राकृत के आचार्यों ने इसी विकासपूर्ण भाषा का उल्लेख अपभ्रंश नाम से किया है। इन आचार्यों के अनुसार 'अपभ्रंश' शब्द का अर्थ बिगड़ी हुई भाषा था।
      • प्राकृत भाषाओं की तरह अपभ्रंश के परिनिष्ठित रूप का विकास भी ‘मध्यदेश’ में ही हुआ था। विभिन्न प्रकृतों सी ही इन क्षेत्रीय अपभ्रंशों का विकास हुआ।
      • प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी ‘डॉ. भोलानाथ तिवारी’ ने विभिन्न प्राकृतों से विकसित अपभ्रंश के निम्नलिखित सात भेद स्वीकार किए हैं, जिनसे आधुनिक भारतीय भाषाओं/उप भाषाओं का जन्म हुआ -
        1. शौरसेनी : पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी और गुजराती
        2. पैशाची : लंहदा , पंजाबी
        3. ब्राचड़ : सिन्धी
        4. खस : पहाड़ी
        5. महाराष्ट्री : मराठी
        6. मागधी : बिहारी, बांग्ला, उड़िया व असमिया
        7. अर्ध मागधी : पूर्वी हिन्दी
      • अतः कहा जा सकता है कि हिन्दी भाषा का विकास अपभ्रंश के शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी रूपों से हुआ है।

आधुनिक भारतीय आर्यभाषा - काल : 1000 ई0 से अब तक : हिंदी एवं अन्य आधुनिक आर्यभाषाएँ

  • 1100 ई0 तक आते-आते अपभ्रंश का काल समाप्त हो गया और आधुनिक भारतीय भाषाओं का युग आरम्भ हुआ।
  • जैसा कि पहले ही बताया गया है कि अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय स्वरूपों से आधुनिक भारतीय भाषाओं/ उप-भाषाओं यथा पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, गुजराती, लंहदा, पंजाबी, सिन्धी, पहाड़ी, मराठी बिहारी, बांग्ला, उड़िया, असमिया और पूर्वी हिन्दी आदि का जन्म हुआ है। आगे चलकर पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, बिहारी, पूर्वी हिन्दी और पहाड़ी पाँच उप-भाषाओं तथा इनसे विकसित कई क्षेत्रिय बोलियों जैसे ब्रजभाषा, खड़ी बोली, जयपुरी, भोजपुरी, अवधी व गढ़वाली आदि को समग्र रूप से हिंदी कहा जाता है।
  • कालांतर में खड़ी बोली ही अधिक विकसित होकर अपने मानक और परिनिष्ठित रूप में वर्तमान और बहुप्रचलित मानक हिंदी भाषा के रूप में सामने आई

नोट :

  • अपभ्रंश और आधुनिक हिन्दी के बीच की कड़ी के रूप में भाषा का एक और रूप प्राप्त होता है। जिसे विद्वानो का एक वर्ग अवहट्ट कहता है। वहीं अधिकांश विद्वान इसे अपभ्रंश ही मानते हैं।
  • अवहट्ट नाम स्पष्ट रूप से विद्यापति की ‘कीर्तिलता’ में आता है-
    “देसिल बयना सब जन मिट्ठा । तें तइसन जम्पओ अवहट्ठा॥”
  • उन्होने इन पंक्तियों में देसिल बयान (देशी कथन) और अवहट्ट को एक ही माना है।
  • अवहट्ट को अपभ्रंश से भिन्न मानने वाले विद्वान इसे हिन्दी का ही पूर्व रूप मानते हैं। स्पष्टतः अवहट्ट को हिन्दी और अपभ्रंश को जोड़ने वाली कड़ी के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

Tuesday, July 5, 2016

हिन्दी साहित्य का इतिहास : काल विभाजन एवं नामकरण

इतिहास के काल विभाजन का आधार एवं उद्देश्य :

  • विभिन्न प्रकाशित, अप्रकाशित रचनाओं के साथ ही साथ विद्वानों द्वारा तमाम आलोचनात्माक व शोधपरक ग्रंथों और रचनाओं व रचनाकारों का परिचय देने वाली अनेक कृतियों को भी कालविभाजन और नामकरण की आधार सामग्री के रूप में लिया गया।
  • समग्र साहित्य को खंडों, तत्वों, वर्गों आदि में विभाजित कर अध्ययन को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने में काल विभाजन सहायक।
  • अंग, उपांग तथा प्रवृत्तियों को समझने एवं स्पष्टता लाने के लिए आवश्यक।

काल विभाजन के आरंभिक प्रयास :

  • 19वीं सदी से पूर्व विभिन्न कवियों और लेखकों द्वारा चौरासी वैष्णवन की वार्ता, दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता, भक्तमाल, कविमाला आदि जैसे कई ग्रंथों में हिन्दी कवियों के जीवनवृत्त और रचना कर्म का परिचय देकर हिन्दी साहित्य के इतिहास और कालक्रम को आधार देने के प्रयास किए जाते रहे हैं. 
  • किंतु हिंदी साहित्य इतिहास के काल विभाजन के आरंभिक प्रयासों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रयास गार्सा द तांसी के ‘इस्तवार द लितुरेत्यूर ऐन्दुई ऐ ऐन्दुस्तानी’, जॉर्ज ग्रियर्सन के ‘द मॉर्डन वर्नाक्यूलर ऑफ हिन्दुस्तान’ मौलवी करीमुद्दीन के तजकिरा-ई-शुअरा-ई-हिंदी (तबकातु शुआस) तथा शिवसिंग सेंगर द्वारा लिखित इतिहास ग्रंथ ‘शिवसिंग सरोज’ में किए गए।
  • गार्सा द तांसी के ग्रंथ ‘इस्तवार द लितुरेत्यूर ऐन्दुई ऐ ऐन्दुस्तानी’ को अधिकांश विद्वान हिंदी का प्रथम इतिहास मानते हैं।
  • प्रथम तर्क संगत प्रयास सन 1934 ई. में मिश्र बंधुओं (पं. गणेश बिहारी मिश्र, डॉ. श्याम बिहारी मिश्र एवं डॉ. शुकदेव बिहारी मिश्र ) द्वारा किया गया ।

मिश्रबंधुओं का काल विभाजन :

मिश्रबंधुओं द्वारा अपनी रचना 'मिश्रबंधु-विनोद' (1913 में तीन भाग तथा 1929 में चौथा भाग) में हिंदी साहित्य के इतिहास को निम्नलिखित 5 भागों और उप-भागों में बांटा गया है: -
  1. आरंभिक काल :
      • पूर्वारंभिक काल :  (700 - 1343 वि.)
      • उत्तरारंभिक काल : (1344 - 1444 वि.)
  2. माध्यमिक काल :
      • पूर्वमाध्यमिक काल : (1445 - 1560 वि.)
      • प्रौढ़ माध्य काल : (1561 - 1680 वि.)
  3. अलंकृत काल :
      • पूर्वालंकृत काल : (1681 - 1790 वि.)
      • उत्तरालंकृत काल : (1791 - 1889 वि.)
  4. परिवर्तन काल : (1890 - 1925 वि.)

  5. वर्तमान काल : (1925 वि. से अब तक )

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काल विभाजन:

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्बारा 1929 में 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' नामक ग्रंथ में किए गए काल विभाजन को ही अब तक सर्वाधिक प्रमाणिक और तार्किक माना जाता रहा है। यह इतिहाल ग्रंथ मूलत: नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित 'हिन्दी शब्द सागर' की भूमिका के रूप में लिखा गया था। उन्होने सम्पूर्ण हिंदी साहित्य को निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया है: -
  1. वीरगाथा काल : (1050 - 1375 वि.)
  2. भक्ति काल : (1375 - 1700 वि.)
  3. रीति काल : (1700 - 1900 वि.)
  4. गद्य काल : (1900 वि. से आगे...)
  • काल विभाजन को सर्वथा नवीन रूप तथा कालों की संख्या सीमित ।
  • अधिकांश विद्वानों द्वारा स्वीकृत, स्पष्ट तथा तर्कसंगत काल विभाजन ।

डॉ. राम कुमार वर्मा का काल विभाजन :

सन् 1938 में प्रकाशित 'हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास' में डॉ. राम कुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य के इतिहास का काल विभाजन निम्नानुसार किया है: -
  1. संधि काल : (750 - 1000 वि.)
  2. चारण काल : (1000 - 1375 वि.)
  3. भक्ति काल : (1375 - 1700 वि.)
  4. रीति काल : (1700 - 1900 वि.)
  5. आधुनिक काल : (1900 वि. से आगे...)

  • केवल वीरगाथा काल को चारण काल कहा, शेष आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा किए गए विभाजन के ही अनुरूप।
  • वस्तुत: देखा जाए तो वीरगाथाएँ चारणों द्वारा ही गाईं जातीं थीं।
  • संधि काल में स्पष्टता का अभाव ।

डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त का काल विभाजन:

सन् 1938 में प्रकाशित 'हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास' (दो भाग) में डॉ. गणपति चन्द्र गुप्त ने शुक्ल जी की मान्यताओं का सतर्क खंडन करते हुए हिंदी साहित्य के इतिहास को प्रमुख रूप से निम्नलिखित भागों में विभाजित किया है :-
  1. प्रारम्भिक काल : (1189 - 1350 ई.)
  2. मध्य काल :
    • पूर्व मध्य काल : (1350 - 1600 वि.)
    • उत्तर मध्य काल : (1600 - 1857 वि.)
  3. आधुनिक काल : (1857 वि. से आगे...)

'एफ. ई . के' द्वारा किया गया काल विभाजन :

वृत्त संग्रहों को आधार मानकर कई अन्य विद्वानों ने भी काल विभाजन का प्रयास किया है। यहां 'एफ. ई . के' द्वारा किया गया काल विभाजन उल्लेखनीय है।
  1. प्राचीन चारण काव्य : ( 1150 - 1400 वि. )
  2. प्राचीन भक्त काव्य : ( 1400 - 1550 वि. )
  3. कबीर के उत्तराधिकारी : ( 1550 - 1750 वि. )
  4. आधुनिक काल : ( 1800 वि. से आगे...)

विभिन्न विद्वानों के विविध मत :

भक्तिकाल और आधुनिक काल के संबंध में विद्बानों में अधिक मतभेद नहीं हैं। केवल वीरगाथा काल और रीतिकाल के नामकरण को लेकर ही कुछ आलोचकों को आपत्ति है। इन कालों के नामकरण के संबंध में कुछ प्रमुख विद्वानों के मत निम्नलिखित हैं।
  • वीरगाथा काल: सिद्ध सामंत युग (राहुल सांकृत्यायन), आदिकाल (डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी), अपभ्रंशकाल (चंद्रधर शर्मा गुलेरी), बीजवपनकाल (महावीर प्रसाद द्विवेदी) आदि।
  • रीतिकाल: कला काल (रमाशंकर शुक्लं ‘रसाल’), शृंगार काल (आचार्य विश्वदनाथ प्रसाद मिश्र), अलंकृत काल (मिश्रबंधु) आदि।

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Saturday, July 2, 2016

हिन्दी कम्प्यूटिंग : कुछ बाधाएं और कुछ उपाय

हिंदी कम्प्यूटिंग से संबन्धित लेखों की शृंखला (Series) का तीसरा लेख

कुछ बाधाएं :

अभी भी हिंदी कम्प्यूटिंग की राह में अनेक अवरोध हैं जिन्हें दूर करके ही डिजिटल हिंदी की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। उदाहरण के लिए निम्नलिखित समस्याएं आज भी राह का रोड़ा बनी हुई हैं:-

  • कम्प्यूटर में हिंदी समर्थन को सक्रिय करने की समस्या:- कम्प्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम में हिंदी समर्थन पहले से ही सक्रिय नहीं रहता है. इसे बाद में सक्रिय करना पड़ता हैं। उल्लेखनीय है की भारत में अभी भी windows Xp पर आधारित कंप्यूटर काफी संख्या में है, जिनमें हिंदी अथवा यूनिकोड सक्रिय करते समय ऑपरेटिंग सिस्टम की सी. डी या किसी विशेष डाटा फाइल की आवश्यकता होती है। इससे यूजर के अंदर मनोवैज्ञानिक रूप से झुंझलाहट की स्थिति बन जाती है और कभी- कभी वह सोचता है कि हिंदी आदि भारतीय भाषाएं सामान्य रूपे से कम्प्यूटर के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
  • हिन्दी की बोर्ड की समस्या:- ऑपरेटिंग सिस्टम में हिंदी सक्रिय होने के बाद भी अगली समस्या आती है की बोर्ड ले-आउट की, क्योंकि कम्प्यूटर का कीबोर्ड बाइडिफॉल्ट अंग्रेजी में ही होता है। कम्प्यूटर में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के लिए भारत सरकार द्वारा मानक INSCRIPT Keyboard इनबिल्ट होता है, जो अभी भी अधिक प्रचलित नहीं है। अत: आसानी से काम करने के लिए अलग से की-बोर्ड सॉफ्टवेयर इंस्टाल करने की आवश्यकता होती है। जबकि अंग्रेजी के साथ ऐसी समस्या नहीं है।
  • हिंदी टाइपिंग की विभिन्न पद्धतियां:- अंग्रेजी टाइपिंग की तरह हिंदी टाइपिंग के लिए आज तक किसी प्रभावी और मानक टाइपिंग विधि का निर्माण नहीं किया जा सका है। हालांकि भारात सरकार ने काफी पहले ही INSCRIPT की बोर्ड को मानक घोषित कर दिया है, किन्तु यह लोकप्रिय नहीं हो सका। हिंदी टाइपिंग के लिई समानान्तर रूप से अनेक विधियां प्रचलित हैं जैसे- फोनेटिक, इनस्क्रिप्ट एवं रेमिंगटन आदि। किसी भी नए प्रयोक्ता के लिए यह भी एक जटिल समस्या हो सकती है कि वह किस पद्धति के साथ आरम्भ करे।
  • पुराने ऑपरेटिंग सिस्टमों में हिंदी सक्रिय करने में समस्या:- हमारे यहां आज भी पुराने ऑपरेटिंग सिस्टम वाले कम्प्यूटर बहुतायत में पाए जाते हैं या कहैं कि भारतीय माध्यम वर्ग के पास अभी में भी विण्डोज एक्सपी या उससे भी पुराने ऑपरेटिंग सिस्टम वाले कम्प्यूटर हैं। इन ऑपरेटिंग सिस्टमों पर हिंदी सक्रिय करना एक जटिल समस्या है।
  • गैर-यूनिकोड प्रोग्रामों में हिंदी टाइपिंग की समस्या:- युनिकोड के आ जाने के बाद भी अभी बहुत सारे प्रोग्रामों खासकर ग्राफिक्स और डीटीपी आदि में केवल 8 बिट ट्रू टाइप फॉन्टों जैसे कृतिदेव आदि के द्वारा और केवल रेमिंगटन टाइपिंग से ही सही हिंदी टाइप सम्भव है। हिंदी के व्यापक प्रयोग में यह एक बड़ी रुकावट है।
  • हिंदी कम्प्यूटिंग के क्षेत्र में जागरुकता का अभाव:- सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में भी कम्प्यूटर में हिंदी प्रयोग के क्षेत्र में जागरुकता का अभाव है। यदि लोग जागरुक हो जाएं और शिक्षा-पाठ्यक्रम में सुधार के साथ छात्रों को उचित समय पर यूनिकोड एवं हिंदी कम्प्यूटिंग की जानकारी से दी जाए तो आधी से अधिक समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाएंगी।

कुछ उपाय:

समस्याओं के साथ ही साथ समाधान खोजने के प्रयास भी होते रहते हैं। विभिन्न तकनीकीविदों ने उक्त समस्याओं के अनेक समाधान भी प्रस्तुत किए हैं। इनमें से ‘ई-पण्डिट’ ब्लॉग पर श्री श्रीस जी द्वारा दिए गए कुछ सुझावों का मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा -
  • ऑपरेटिंग सिस्टमों में हिन्दी-इण्डिक सपोर्ट:- ऑपरेटिंग सिस्टमों में हिंदी – इण्डिक सपोर्ट पहले से ही मौजूद होना चाहिए, जिससे इसे सक्रिय करने का झंझट समाप्त हो जाए। माइक्रोसॉफ्ट के विण्डोज विस्टा और इसके बाद वाले नए ऑपरेटिंग सिस्टम में यह इनबिल्ट हो चुका है। अतः इस बारे में निश्चिंत रह सकते हैं कि आने वाले समय में नए ऑपरेटिंग सिस्टमों इण्डिक सपोर्ट पहले से ही मौजूद होगा इस तरह इस समस्या का समाधान कुछ समय बाद स्वत: ही हो जाएगा।
  • विण्डोज में हिन्दी के वैकल्पिक कीबोर्ड इनबिल्ट हों:- हिन्दी की बोर्ड को अलग से इंस्टाल करने की समस्या से छुटकारा पाने के लिए विण्डोज इंस्टाल करने पर हिन्दी लिखने के लिए हिंदी आईएमई या अन्य कीबोर्ड पहले से ही उपल्ब्ध होने चाहिए। अभी विण्डोज में सिर्फ इनस्क्रिप्ट आईएमई ही इनबिल्ट होता है, फोनेटिक तथा रेमिंगटन नहीं है। अगर ऑपरेटिंग सिस्टम में ये टाइपिंग टूल पहले से ही मौजूद होंगे तो अन्य स्रोतों से डाउनलोड कर इंस्टाल करने से मुक्ति तो मिलेगी ही, हिंदी कम्प्यूटिंग में क्रांतिकारी बदलाव आ जाएगा।
  • पुराने ऑपरेटिंग सिस्टमों में यूनिकोड समर्थन:- विण्डोज 98 से पहले के ऑपरेटिंग सिस्टमों में यूनिकोड का सीमित समर्थन ही है। क्योंकि इनके लिए प्रचलित आईएमई जैसे बाराह, इंडिक आईएमई आदि जैसे कीबोर्ड ड्राइवर न तो अब उपल्ब्ध हैं और नहीं बनाए जा सकते हैं। अभी इसका उपाय ब्राउजरों के लिए IME प्लगइन से ही किया जा सकता है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त कुछ अन्य सुझाव भी ध्यान देने योग्य हैं जैसे – गैर यूनिकोडित प्रोग्रामों के लिए एक नॉन-यूनिकोड आईएमई/कीबोर्ड ड्राइवर बनाया जाय। हिंदी टंकण के लिए अंग्रेजी की तरह किसी एक उपयुक्त एवं मानक पद्धति को अनिवार्य कर सरकार द्वारा अभियान चलाकर उसे लोकप्रिय किया जाना चाहिए। कम्प्यूटर में हिन्दी के व्यापक प्रयोग को दृष्तिगत रखते हुए तथा शत-प्रतिशत हिंदी कम्प्यूटिंग का सपना देखने से पहले हमारे लिए विभिन्न सॉफ्टवेयरों का मानक हिंदी में अनुवाद करना अनिवार्य होगा। इन सबके अतिरिक्त आज के समय में कम्प्यूटर पाठ्यक्रमों में हिन्दी/इण्डिक कम्प्यूटिंग को स्थान देना सबसे बड़ी आवश्यकता है। सूचना प्रद्यौगिकी में अग्रणी भारत देश में किसी भी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम में इण्डिक कम्प्यूटिंग विषय शामिल नहीं है। अच्छे-अच्छे आईटी प्रोफैशनलों को भी यूनिकोड के बारे पता नहीं हैं। यूनिकोड का नाम सुनते ही वो बगलें झांकने लगते हैं। ऐसे लोग हिंदी कम्प्यूटिंग में क्या योगदान दे पाएंगे। अत: हर विश्वविद्यालयी कम्प्यूटर पाठ्यक्रम में इण्डिक कम्प्यूटिंग विषय शामिल होना चाहिए जिसमें यूनिकोड, इनस्क्रिप्ट तथा अन्य टाइपिंग प्रणालियाँ, देवनागरी लिपि का परिचय, हिन्दी कम्प्यूटिंग के मौजूदा साधन तथा बहुभाषी सॉफ्टवेयरों (Multilingual Softwares) का विकास, प्राकृतिक भाषा संसाधन (Natural Language Processing) आदि की जानकारी शामिल हो।

और आखिर में कुछ अपनी बात:

इंटरनेट पर ब्लॉग, वेबसाइट आदि पर कोई पाठक अथवा जिज्ञासु गूगल जैसे सर्च इंजनों के माध्यम से ही पहुंचता है। यदि गूगल अपना इण्डिक ट्रांसलिट्रेशन टूल ‘Google India’ पेज तथा जीमेल पर लगा दे तो हिन्दी टाइपिंग और ब्लॉगिंग से अनभिज्ञ लोग भी इससे परिचित होंगे और हिंदी कम्प्यूटिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। सबसे महत्वपूर्ण होगा यूनिकोड के बारे में अधिक से अधिक जागरुकता फैलाना। परिस्थितियों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि आज के समय में उन्हीं भाषाओं का अस्तित्व बच पाएगा जो इंटरनेट और कम्प्यूटिंग से जुड़ी होंगी। इस कसौटी पर हिंदी को खरा उतरने के लिए हिंदी में लिखने, खोजने, संदेश भेजने, सहेजने, फॉण्ट परिवर्तन करने संबंधी आदि विभिन्न सॉफ्टवेयरों की आवश्यकता होगी। अत: वर्तमान परिदृश्य में हिंदी कम्प्यूटिंग का महत्व और बढ़ जाता है। कम्प्यूटर के जरिए ही हिंदी एक वैश्विक भाषा का रूप ले सकेगी और विश्व की महत्वपूर्ण भाषाओं के बीच एक सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकेगी। हिंदी के नाम पर प्रतियोगिताओं, बैठकों, पुरस्कार योजनाओं आदि के साथ ही हिंदी कम्प्यूटिंग की ओर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। हिंदी को कम्प्यूटर पर उसका उचित स्थान दिलाकर ही सच्चे अर्थों में हिंदी को एक सशक्त भाषा बनाया जा सकता है।

नोट: हिंदी कम्प्यूटिंग से संबन्धित तीन लेखों की शृंखला (Series) में का तीसरा और अंतिम लेख है, इस कड़ी के अन्य लेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें और कमेन्ट बॉक्स के माध्यम से अपने विचार और प्रतिक्रियाओं से अवगत कराएं।

पहला लेख "हिन्दी कम्प्यूटिंग : एक परिचय" यहाँ से पढ़ें।
दूसरा लेख "हिन्दी कम्प्यूटिंग : आधारभूत तत्व एवं वर्तमान स्वरूप" यहाँ से पढ़ें।
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